Labels

Showing posts with label cinema. Show all posts
Showing posts with label cinema. Show all posts

Tuesday, 27 September 2016

बाजीराव मस्तानी :गुरुर और सुरूर का वाटर लू ।

बाजीराव मस्तानी :गुरुर और सुरूर का वाटर लू -----------------------------------
कुछ भी कहिए रणवीर के अलावा किसी और अभिनेता का माद्दा नहीं था बाजीराव को जीने का । दरबार में आते हुए बाजीराव की पिंडलियों की ऊर्जा शरीर का आकार कैसे लेती है , शुरूआती दृश्यों में देखिए । उदंड प्रेमी कैसे अट्टहास भरता है - पेशवा को कचहरी में गद्दी पर बैठते हुए देखिए ।
काशीबाई का चरित्र इस करीने से रोपा गया है की आप पत्नी के सोतिया डाह को सीधे पकड़ सकते है । फ़िल्म अपने आप में प्रेम का काव्य है , सोते हुए पढ़िए या फिर रोते हुए - आपकी इच्छा !
बाजीराव मस्तानी असल में समय को पार करती हुई वर्तमान की साजिश में लहूलुहान कथा है । ब्राह्मण सेनापति जिसने हिन्दू पद पादशाही का सिद्धान्त गढ़ा, अपना जीवन घोड़े की पीठ पर गेहूं की बलिया मसल कर खाते हुए गुजारा , उसे अगर किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम हो जाए तो सेनापति के मनोविज्ञान की थाह आपकी बुद्धि के दायरे से बाहर हो जाती है । प्रेमिका इतनी दुःसाहसी की पूरे समय अपने चेहरे पर पत्नी और रखैल के द्वन्द को जीती है । अपने प्रेम के लिए वह युद्ध कला छोड़कर शुद्ध कला के जीवन में प्रवेश करती है और आपको भी प्रेम दीवानगी का पाठ पढ़ाने का प्रयास करती है । आप पढना चाहे न चाहे , अलग बात है  .
फ़िल्म में कैमरा जिस अक्ष से गुजरता है उस अक्ष से आप शायद कभी न गुजरे हो , दिल शायद उन अक्षांशों और देशान्तरों से बिलख कर निकला हो शायद कभी ! सीढ़ी उतरती हुई नायिका , नाचती हुई कोरस पात्र , पानी के फव्वारों के पीछे से गुजरता हुआ दृश्य आपको ट्रांस में ले जाने के लिए नाकाफी नहीं है । पानी समय को पार पाने का यंत्र है फ़िल्म में । जब भी कोई पात्र पानी में उतरता है , कहानी में समय अपनी लय खो देता हुआ सा लगता है । अंतिम दृश्य में बाजीराव पानी में तलवार चलाता है - आप पसीना पसीना है ।
दुआ कीजिए आपको कभी इश्क न हो ...।

बाजीराव मस्तानी :गुरुर और सुरूर का वाटर लू ।

बाजीराव मस्तानी :गुरुर और सुरूर का वाटर लू -----------------------------------
कुछ भी कहिए रणवीर के अलावा किसी और अभिनेता का माद्दा नहीं था बाजीराव को जीने का । दरबार में आते हुए बाजीराव की पिंडलियों की ऊर्जा शरीर का आकार कैसे लेती है , शुरूआती दृश्यों में देखिए । उदंड प्रेमी कैसे अट्टहास भरता है - पेशवा को कचहरी में गद्दी पर बैठते हुए देखिए ।
काशीबाई का चरित्र इस करीने से रोपा गया है की आप पत्नी के सोतिया डाह को सीधे पकड़ सकते है । फ़िल्म अपने आप में प्रेम का काव्य है , सोते हुए पढ़िए या फिर रोते हुए - आपकी इच्छा !
बाजीराव मस्तानी असल में समय को पार करती हुई वर्तमान की साजिश में लहूलुहान कथा है । ब्राह्मण सेनापति जिसने हिन्दू पद पादशाही का सिद्धान्त गढ़ा, अपना जीवन घोड़े की पीठ पर गेहूं की बलिया मसल कर खाते हुए गुजारा , उसे अगर किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम हो जाए तो सेनापति के मनोविज्ञान की थाह आपकी बुद्धि के दायरे से बाहर हो जाती है । प्रेमिका इतनी दुःसाहसी की पूरे समय अपने चेहरे पर पत्नी और रखैल के द्वन्द को जीती है । अपने प्रेम के लिए वह युद्ध कला छोड़कर शुद्ध कला के जीवन में प्रवेश करती है और आपको भी प्रेम दीवानगी का पाठ पढ़ाने का प्रयास करती है । आप पढना चाहे न चाहे , अलग बात है  .
फ़िल्म में कैमरा जिस अक्ष से गुजरता है उस अक्ष से आप शायद कभी न गुजरे हो , दिल शायद उन अक्षांशों और देशान्तरों से बिलख कर निकला हो शायद कभी ! सीढ़ी उतरती हुई नायिका , नाचती हुई कोरस पात्र , पानी के फव्वारों के पीछे से गुजरता हुआ दृश्य आपको ट्रांस में ले जाने के लिए नाकाफी नहीं है । पानी समय को पार पाने का यंत्र है फ़िल्म में । जब भी कोई पात्र पानी में उतरता है , कहानी में समय अपनी लय खो देता हुआ सा लगता है । अंतिम दृश्य में बाजीराव पानी में तलवार चलाता है - आप पसीना पसीना है ।
दुआ कीजिए आपको कभी इश्क न हो ...।

पिंक फिल्म के बहाने औरत का स्पेक्ट्रम

क्या पिंक नाम की फिल्म पर बिना फिल्म देखें ही समीक्षात्मक टिप्पणी की जा सकती है . हाँ , क्यों नहीं. फिल्म, पिंक,और महिला को हम जानते ही है . और अगर पिंक भारतीय महिलाओं पर प्रकाश डालती है, तो बेशक टिप्पणी की जा सकती हैं .
सोचता हूँ, इस फिल्म का नाम 'पिंक' क्यों रखा गया है . क्या इसलिए कि 'ब्लू' भी फिल्म ही होती है , और वह भी महिलाओं को केंद्र में रख कर ही बनाई जाती है . इस लिहाज से ही 'ब्लेक' नामक फिल्म भी महिला पर बनाई गई थी. संयोग से अमिताभ बच्चन साहब ब्लेक में भी मुख्य भूमिका में रहे थे .
'पिंक' तो नहीं देखी , मगर 'ब्लू' देखी है और अमिताभ को भी देखा है कई फिल्मो में . सवाल यह है की महिलाओ को केंद्र में रख कर बनाई फिल्में रंगों के नाम पर क्यों बनाई जा रही है. क्या इंसान की नियति रंग देखना महिलाओ के सहयोग से ही संभव है. हमारी माएँ , बहनें, पत्नियाँ, प्रेमिकाएँ रंगों का इन्द्रधनुष है क्या ? और अगर है, तो फिर अलग अलग रंगों से क्यों संकेत करते रहते है हम.
विज्ञान में 'स्पेक्ट्रम' नाम का एक फिनोमेना पढ़ा जाता है. प्रकाश को प्रिज्म से गुजारने पर प्रकाश सात रंगों में बंट जाता है. बैंगनी रंग सबसे नीचे रहता है और लाल रंग सबसे ऊपर होता है इस इन्द्रधनुषी स्पेक्ट्रम में. गहरा नीला सबसे नीचे रहता है, इसीलिए हम 'ब्लू' फिल्म को सबसे कमजोर दर्जा देते है क्या ? और लाल रंग सबसे ऊपर होता है, क्या क्रांति और महिला की स्वतंत्रता इसीलिए हमारे मष्तिष्क के स्पेक्ट्रम से बाहर है. हम डरते है शायद औरत की स्वतंत्रता से. सो ब्लू फिल्म बना कर उसकी देह पर अधिकार करके उसे लाल रंग तक यात्रा करने ही नहीं देना चाहते.
विज्ञान में एक और फिनोमेना पढ़ा जाता है. ;ब्लू शिफ्टिंग' और 'रेड शिफ्टिंग' . ब्रह्मांड को पढ़ते समय ये दोनों फिनोमेना खूब पढ़े जाते है; अगर किसी तारे से आ रही उर्जा नीले स्पेक्ट्रम की और शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे नजदीक है . और किसी तारे से आ रही प्रकाश उर्जा लाल रंग के स्पेक्ट्रम की ओर शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे बड़ी तेजी से दूर भाग रहा है .
औरत वही तारा है जो ब्रह्मांड में हमसे दूर जा रहा है . रेड शिफ्टिंग से बचने के लिए हम 'ब्लू' फिल्म का सहारा लेकर उसे कैद करना चाह रहे है. मगर कब तक सम्भव है ! रेड शिफ्टिंग से इंसानियत कब तक बचती रहेगी, मुहँ छिपाती रहेगी, भागती रहेगी .
स्पेक्ट्रम में 'पिंक' रंग नही है . मगर फिल्म का नाम है पिंक. हो सकता है औरत के लिए अपना प्रकाश और उर्जा तैयार करने की दिशा में निर्देशक नैतिक बल प्राप्त करने में खुद को कमजोर देखता हो सो वह लाल की जगह पिंक रंग के लिए ही स्थान खोज पाया हो.
अमिताभ ने 'ब्लेक' से 'पिंक' का सफ़र औरत के साथ किया है. रेखा की स्मृति, यादें, उसकी उदास तन्हाई, अमिताभ के प्रति समर्पित भूतकाल. अमिताभ ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को उन स्मृतियों के कारण तो नहीं भर रहे है कही ? भरे , कोई दिक्कत नहीं है .
आम आदमी को इस स्मृति को भरने का साधन नहीं होना है .जीवन में रेखा रही हो या नहीं हो . कम से कम हम तो ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को रोक सकते है . हमे प्रिज्म से गुजरती स्त्री और बिखर कर रंगों में टूटती स्त्री को स्पेक्ट्रम होने से रोकना चाहिए . गाँधी कहते थे , सत्याग्रह स्त्री के चरित्र और व्यवहार के अधिक नजदीक है. बताइए, स्त्री के जिस प्रकाश ने अंग्रेजो के सूरज को डुबो दिया. वह प्रकाश हमारे जीवन में कितने सूरज उगा सकता है . ब्लू ,ब्लेक,पिंक के रूप में स्त्री को क्यों देखते है . एक बार मन से उसके प्रकाश को प्रिज्म से गुजरने से रोकिए. यूँ ही मूल रूप से अहसास कीजिए .
रंगीन हो जाएगी जिन्दगी . इसलिए ही तो सारी दौड़ भाग रहे है हम.














Thursday, 26 May 2016

जॉन अब्राहम ; अब'रहम करो जॉन

फरहान उर्फ़ जॉन अब्राहम ।
इस आदमी को पहली बार JGB  के एलबम में देखा था । गहरी आँखे , डिम्पल धँसा चेहरा ,लम्बा कद और तीखे कँधे । लगता था की यूनानी देवता की सन्तान है अखिलीज और हरक्यूलस की तरह ।
शारीरिक बनावट अपनी जगह है मगर जब आवारापन देखी तब निर्णय हुआ की जॉन बहुत उम्दा ऐक्टर भी है । जब करीना कपूर ने बिपाशा बसु को कहा की उसके बॉय फ्रेंड का चेहरा पत्थर की तरह का है , तभी से करीना दिल से उतर गई । कोई जा कर कहे उसे की फॉर्मल शर्ट में जॉन से बेहतर कोई फबता है क्या ? कौन मॉडल है जो सूट के साथ चप्पल पहन कर भी रेम्प से लेकर बॉलीवुड पार्टियो में पहुँच जाता है - और उन्हें रौंद भी देता है ।
मद्रास कैफे बना कर (प्रोड्यूसर) जॉन ने न केवल एक महत्वपूर्ण घटना पर बहुत हद तक सच्ची फ़िल्म बनाने का साहस किया है । कई फिल्मो में जॉन का होना ही जरुरी लगता है । धूम में जॉन हायबुसा का विकल्प थे और कस्बो में लड़को ने उसी किरदार से बाल रखकर बाइक्स दौड़ाई थी । धूम सीरीज में आमिर और जॉन के नेगेटिव किरदार की तुलना दिल पर हाथ रख कर करेंगे तो दूसरा हाथ जॉन के पक्ष में उठेगा । कोशिश कर लीजिए ।
ईसाई पिता और फारसी माता की संतान जॉन यूरोप और फारस के मध्य किसी जगह का मध्यकालीन लड़ाका सा लगता है जो भटक कर खेबर दर्रे से होता हुआ मुल्तान की दरगाहों में विश्राम करके वहाँ से नशीली आँखे उधार ले कर भारत आ गया ।
लव यू जॉन ,अब'रहम ( भी करो यार )