बाजीराव मस्तानी :गुरुर और सुरूर का वाटर लू -----------------------------------
कुछ भी कहिए रणवीर के अलावा किसी और अभिनेता का माद्दा नहीं था बाजीराव को जीने का । दरबार में आते हुए बाजीराव की पिंडलियों की ऊर्जा शरीर का आकार कैसे लेती है , शुरूआती दृश्यों में देखिए । उदंड प्रेमी कैसे अट्टहास भरता है - पेशवा को कचहरी में गद्दी पर बैठते हुए देखिए ।
काशीबाई का चरित्र इस करीने से रोपा गया है की आप पत्नी के सोतिया डाह को सीधे पकड़ सकते है । फ़िल्म अपने आप में प्रेम का काव्य है , सोते हुए पढ़िए या फिर रोते हुए - आपकी इच्छा !
बाजीराव मस्तानी असल में समय को पार करती हुई वर्तमान की साजिश में लहूलुहान कथा है । ब्राह्मण सेनापति जिसने हिन्दू पद पादशाही का सिद्धान्त गढ़ा, अपना जीवन घोड़े की पीठ पर गेहूं की बलिया मसल कर खाते हुए गुजारा , उसे अगर किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम हो जाए तो सेनापति के मनोविज्ञान की थाह आपकी बुद्धि के दायरे से बाहर हो जाती है । प्रेमिका इतनी दुःसाहसी की पूरे समय अपने चेहरे पर पत्नी और रखैल के द्वन्द को जीती है । अपने प्रेम के लिए वह युद्ध कला छोड़कर शुद्ध कला के जीवन में प्रवेश करती है और आपको भी प्रेम दीवानगी का पाठ पढ़ाने का प्रयास करती है । आप पढना चाहे न चाहे , अलग बात है .
फ़िल्म में कैमरा जिस अक्ष से गुजरता है उस अक्ष से आप शायद कभी न गुजरे हो , दिल शायद उन अक्षांशों और देशान्तरों से बिलख कर निकला हो शायद कभी ! सीढ़ी उतरती हुई नायिका , नाचती हुई कोरस पात्र , पानी के फव्वारों के पीछे से गुजरता हुआ दृश्य आपको ट्रांस में ले जाने के लिए नाकाफी नहीं है । पानी समय को पार पाने का यंत्र है फ़िल्म में । जब भी कोई पात्र पानी में उतरता है , कहानी में समय अपनी लय खो देता हुआ सा लगता है । अंतिम दृश्य में बाजीराव पानी में तलवार चलाता है - आप पसीना पसीना है ।
दुआ कीजिए आपको कभी इश्क न हो ...।
Tuesday, 27 September 2016
बाजीराव मस्तानी :गुरुर और सुरूर का वाटर लू ।
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cinema
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