Sunday, 18 September 2016

अग्नि मन्त्र

ओ अंतरिक्ष के देवता ! हमारी गुमनाम चिट्ठियाँ पहुँचाओ ईश्वर को। वे चिट्ठियाँ , जो मन्नतों के धागों से बन्धी है मन्दिरों के वृक्षों पर, इबादतगाहों की पिछली दीवार की जालियों पर।
कहों तो जरा ईश्वर से, की मनुष्य की आपत्तियाँ आई हैं । हमारी आपत्ति है कि, मृत्यु को नया जीवन मानने के बाद भी प्रति प्रश्न खत्म क्यों नही होते हैं। क्यों मृत्यु और जीवन के बीच का संक्रमणकाल इतना दुरूह और कष्टदायी हैं। क्यों जीवन में सम्बन्धो का कलश संवादों के बावजूद इतना संवादहीन हैं। क्यों मृत्युमय नव जीवन इतना बलिदानपूर्ण हैं।
कहों हमारें ईश्वर से, अन्नदाता का आसन त्याग कर खेत में खड़े किसान के पसीने को अंजलि में भरें और कहे की अंजलि में ईश्वर के बच्चे का भ्रूण है, अगला ईश्वर यही से पैदा होगा।
कहो अपने ईश्वर से कि, गाभिन स्त्री के पैरों पर आईना जँचा दे। ताकि दुनियाँ अपना अक्स देख सके , चेहरा पोंछ सकें।
ओ अंतरिक्ष के देवता ! हमारें धागों को जोड़कर रस्सी बना दो। एक दिन सारी मानवता आरोहण की आकांशी हो जायेगी। हम तालाब में गिरने की बजाए रस्सी पकड़ना ठीक समझेंगे।
'अग्नि मन्त्र'

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