Sunday, 18 September 2016

दाना माँझी

दाना मांझी की इन तस्वीरों को देख कर लगा कि मुझ जैसे बहुत से लोगों को खबरे पढ़ना बन्द कर देना चाहिए। कम जानकारी भी स्वास्थ्य के लिए बहुत हद तक ठीक रहती हैं।
दाना अपनी पत्नी की लाश को उठाए घर आ गया, और हिन्द महासागर में एक जलजला उठा। हाय हाय के नारों से चौंक उठा वातावरण। फिर क्या हुआ आगे।
दाना को प्लेन का टिकट मिला, वह दिल्ली आया और बहरीन के राजदूत ने बहरीन सुलतान की ओर से 9 लाख रुपये भेंट किए। वह वापस आ गया, पूछा तो बताया की बेटियों को पढ़ा कर इंसान बनाएगा। सही बात है, पत्नी की मौत के बाद मिले पैसों से आदमी डोनेशन की सीट तो नही खरीद सकता। पग पग शर्मसार होती इंसानियत के खातिर वह कम से कम अपनी बेटियों को इंसान बनाने का संकल्प तो ले ही सकता हैं।
कभी विचार आता है, क्या हो गया आदमियत को। क्या इंसान बनने का ठेका छोटे आदमी के नाम ही छूटता है हमेशा! कैलाश खैर का एक गीत है- तेरी दीवानी। गीत में तीन चार कहानियां समानांतर चलती हैं। जब ट्रक में बैठकर एक प्रेमिका जाती हुई दिखती है, तो उसका साधारण सा दिखने वाला प्रेमी उसे देखता भर रह जाता है। उसकी आँखों में उचटती उदासी है। ठीक इस सीन के पास दूजा सीन यह की एक मुस्लिम प्रेमी अपनी प्रेमिका की तरफ चाकू ले कर बढ़ता है। और ट्रक वाला प्रेमी थोड़ी दूर तक भागने की कोशिश करता हैं। दोनों कहानियां अलग अलग है, मगर लगता है जैसे अपनी प्रेमिका से बिछड़ा हुआ आदमी, किसी दूसरी प्रेमिका को चाकू के हमले से बचाने के लिए दौड़ना चाहता हैं।
दाना ,आप और मैं। हमारी कहानियां समानांतर है, दाना की प्रेयसी मर चुकी है। और हम अपनी प्रिय सम्वेदनाओं के प्रयासरत हत्यारें बने बैठे है।दाना की प्रेमिका को हम बचा नही सके, सो अब दाना स्वयं ही दशरथ मांझी की तरह हमारे मन का पहाड़ तोड़ कर अपनी बेटियो को इंसान बनाना चाहता है। ताकि वे किसी के प्रेम को बचाने के लिए दौड़ सके।
ये दलित आदिवासी क्यों है। हम सभ्रांत है इसलिए। जिस दिन ये दलित और आदिवासी नही रहेंगे, हम उससे पहले खत्म हो चुके होंगे। इस बार तो दाना माँझी का संकल्प मनुष्यता को बचा रहा हैं। अगली बार क्या होगा , कह नही सकते।

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