Sunday, 18 September 2016

कालचक्र

कल्पना, रोटी, धोती और स्लेट। गाँव के पीपल पर टँकी हुई है चमकादड की तरह। औरते पीपल के किनारे बसे तालाब से पानी भर कर ले जा रही है, पीपल के नीचे से गुजरते हुए पानी से छींट दे रही है कल्पना को। रोटी भीग कर धोती पर दाग की तरह गिर पड़ती है। यह दृश्य देख कर स्लेट मुस्कुरा देती है पीपल की तरफ।
पीपल याद कर लेता है अपने पुराने दिन, जब बुद्ध बैठे थे छाया में।
स्त्रियों का दल लौट जाता है इस दृश्य को फिर से देखने के लिए।
'काल चक्र'

No comments:

Post a Comment