Wednesday, 21 September 2016

भारत-पाक युद्ध उन्माद

उरी हमलें के बाद हर तीसरा व्यक्ति या तो हताश है, या हमले और आक्रमण की पैरवी कर रहा हैं। युद्ध की वकालत हो रही है। जानकार कह रहे है की 'जन भावनाओं' को देख कर युद्ध नही लड़े जाते। बात तो ठीक है, मगर ये जनभावना युद्ध की पैरवी ही क्यों कर रही है? अन्य विकल्प क्यों नही सुझा रही! जनता मूल रूप से हिंसक ही होती है, या फिर भारत-पाक नामक फिनोमेना युद्ध के आग्रह का पर्यायवाची है।
बहुत से ऐतिहासिक कारण हैं, जो जनता को युद्ध की वकालत को बाध्य करते है।
मगर फिर भी प्रश्न उठता है, कि हमारा इतिहास बोध इतना जुझारू है वाकई! इतना कि लगभग हर तीसरा व्यक्ति युद्ध की अनिवार्यता को ठान कर बैठ ही जाए ! इतना हिंसक समाज तो नही है हमारा।
कही ऐसा तो नही है कि सरकारों की विफलता को जनता भोग रही है! विभाजन, तीन प्रत्यक्ष युद्ध और निरन्तर चल रहे छद्म युद्ध जनता की सफलता असफलता से इतर पाक नामक मुद्दे को लेकर सरकार की शालीन असफलता का चिह्न बन गया हैं। सरकारों की सफलता उनकी निजी सफलता बन जाती है, मगर उनकी असफलता जनता के लिए अदृश्य बोझ है। और जनता इस बोझ को युद्ध के जरिए उतारना चाहती हैं।
अठ्ठारह जवानों के शहीद होने के बाद जिस युद्ध की कल्पना की जा रही हैं, उसमे और सैनिक शहीद नहीं होंगे ? नागरिक हताहत नही होंगे ? यह विवेक लोग खूब समझते हैं। मगर आप अपने कृत्य पर आप शर्मिंदा नही है, तो बिना गलती किए भी मुझे शर्मिंदा होना पड़ेगा।
सरकारों ने इस फिनोमेन को शर्मिंदगी की हद तक असफल कर दिया है सात दशकों में, चूँकि वो शर्मिंदा नही होती हैं। सो नागरिक शर्मिंदा होकर युद्ध का आग्रह कर रहा हैं।
वह भी जानता हैं की युद्ध किसी समस्या का समाधान नही हैं। मगर यह समस्या है ही नही अब नागरिक के लिए। यह तो शर्मिंदगी से बचने के लिए किया जा रहा आत्मदाह जैसा उन्माद है।

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