Sunday, 18 September 2016

प्रेमिका

कई स्त्रियाँ उसके प्रेम में थी। उसने एक से कहा, मुझे पाना है तो चित्रकारी करो। एक से कहा, बच्चों को पढ़ाओ। एक से , माँ होने को कहा। और एक से सिलाई करने को कहा।
कालांतर में , एक चित्रकार हो गई और कवि भी। एक विश्व विद्यालय में दर्शनशास्त्र की अध्यापिका। एक का बेटा वीणा वादक बन गया और एक कस्बे की सबसे बड़ी सिलाई सेविका हो गई।
बातों ही बातों में वे सब हँस पड़ी एक रोज, जब आपस में मिली। उनकी हंसी में उस बर्बाद आदमी के प्रति सम्वेदना और खुद के मुकाम का मिला जुला रस था।
एक पेड के नीचे अपने फटे हुए जूते से पानी निकालते वक्त जब वो सामूहिक हंसी पेड़ की डाली पर आ बैठी।
वह मुस्कुराते हुए बोला, उन्होंने जो पाया वह जो भी है। बस मैं नही हूँ।

1 comment:

  1. अतृप्त इच्छाओं की बानगी! मन की अनसुलझी गुथियाँ या कल्पना के अनेकों आयाम!

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