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Tuesday, 27 September 2016

पिंक फिल्म के बहाने औरत का स्पेक्ट्रम

क्या पिंक नाम की फिल्म पर बिना फिल्म देखें ही समीक्षात्मक टिप्पणी की जा सकती है . हाँ , क्यों नहीं. फिल्म, पिंक,और महिला को हम जानते ही है . और अगर पिंक भारतीय महिलाओं पर प्रकाश डालती है, तो बेशक टिप्पणी की जा सकती हैं .
सोचता हूँ, इस फिल्म का नाम 'पिंक' क्यों रखा गया है . क्या इसलिए कि 'ब्लू' भी फिल्म ही होती है , और वह भी महिलाओं को केंद्र में रख कर ही बनाई जाती है . इस लिहाज से ही 'ब्लेक' नामक फिल्म भी महिला पर बनाई गई थी. संयोग से अमिताभ बच्चन साहब ब्लेक में भी मुख्य भूमिका में रहे थे .
'पिंक' तो नहीं देखी , मगर 'ब्लू' देखी है और अमिताभ को भी देखा है कई फिल्मो में . सवाल यह है की महिलाओ को केंद्र में रख कर बनाई फिल्में रंगों के नाम पर क्यों बनाई जा रही है. क्या इंसान की नियति रंग देखना महिलाओ के सहयोग से ही संभव है. हमारी माएँ , बहनें, पत्नियाँ, प्रेमिकाएँ रंगों का इन्द्रधनुष है क्या ? और अगर है, तो फिर अलग अलग रंगों से क्यों संकेत करते रहते है हम.
विज्ञान में 'स्पेक्ट्रम' नाम का एक फिनोमेना पढ़ा जाता है. प्रकाश को प्रिज्म से गुजारने पर प्रकाश सात रंगों में बंट जाता है. बैंगनी रंग सबसे नीचे रहता है और लाल रंग सबसे ऊपर होता है इस इन्द्रधनुषी स्पेक्ट्रम में. गहरा नीला सबसे नीचे रहता है, इसीलिए हम 'ब्लू' फिल्म को सबसे कमजोर दर्जा देते है क्या ? और लाल रंग सबसे ऊपर होता है, क्या क्रांति और महिला की स्वतंत्रता इसीलिए हमारे मष्तिष्क के स्पेक्ट्रम से बाहर है. हम डरते है शायद औरत की स्वतंत्रता से. सो ब्लू फिल्म बना कर उसकी देह पर अधिकार करके उसे लाल रंग तक यात्रा करने ही नहीं देना चाहते.
विज्ञान में एक और फिनोमेना पढ़ा जाता है. ;ब्लू शिफ्टिंग' और 'रेड शिफ्टिंग' . ब्रह्मांड को पढ़ते समय ये दोनों फिनोमेना खूब पढ़े जाते है; अगर किसी तारे से आ रही उर्जा नीले स्पेक्ट्रम की और शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे नजदीक है . और किसी तारे से आ रही प्रकाश उर्जा लाल रंग के स्पेक्ट्रम की ओर शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे बड़ी तेजी से दूर भाग रहा है .
औरत वही तारा है जो ब्रह्मांड में हमसे दूर जा रहा है . रेड शिफ्टिंग से बचने के लिए हम 'ब्लू' फिल्म का सहारा लेकर उसे कैद करना चाह रहे है. मगर कब तक सम्भव है ! रेड शिफ्टिंग से इंसानियत कब तक बचती रहेगी, मुहँ छिपाती रहेगी, भागती रहेगी .
स्पेक्ट्रम में 'पिंक' रंग नही है . मगर फिल्म का नाम है पिंक. हो सकता है औरत के लिए अपना प्रकाश और उर्जा तैयार करने की दिशा में निर्देशक नैतिक बल प्राप्त करने में खुद को कमजोर देखता हो सो वह लाल की जगह पिंक रंग के लिए ही स्थान खोज पाया हो.
अमिताभ ने 'ब्लेक' से 'पिंक' का सफ़र औरत के साथ किया है. रेखा की स्मृति, यादें, उसकी उदास तन्हाई, अमिताभ के प्रति समर्पित भूतकाल. अमिताभ ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को उन स्मृतियों के कारण तो नहीं भर रहे है कही ? भरे , कोई दिक्कत नहीं है .
आम आदमी को इस स्मृति को भरने का साधन नहीं होना है .जीवन में रेखा रही हो या नहीं हो . कम से कम हम तो ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को रोक सकते है . हमे प्रिज्म से गुजरती स्त्री और बिखर कर रंगों में टूटती स्त्री को स्पेक्ट्रम होने से रोकना चाहिए . गाँधी कहते थे , सत्याग्रह स्त्री के चरित्र और व्यवहार के अधिक नजदीक है. बताइए, स्त्री के जिस प्रकाश ने अंग्रेजो के सूरज को डुबो दिया. वह प्रकाश हमारे जीवन में कितने सूरज उगा सकता है . ब्लू ,ब्लेक,पिंक के रूप में स्त्री को क्यों देखते है . एक बार मन से उसके प्रकाश को प्रिज्म से गुजरने से रोकिए. यूँ ही मूल रूप से अहसास कीजिए .
रंगीन हो जाएगी जिन्दगी . इसलिए ही तो सारी दौड़ भाग रहे है हम.














Friday, 23 September 2016

ग्रामीण देह की बू

एक ग्रामीण स्त्री की महक बटी हुई है । उसके कंधो से वजन उठाते हुए बाजुओं की गन्ध है; कपड़ो में सिली हुई। उसके सर से सरसों के तेल की बू आती है; मिट्टी और सिंदूर से भरी हुई। उसके पैरों से खेत की मिट्टी, पगडण्डी की भभूत और आवारा खरपतवार से उड़ कर आए वृताकार काँटों की बास आती है।
उसके ब्लाउज पर दूध के बड़े बड़े चकते मन्डे हुए है, जिससे बास आती है सुबह से रखे दूध सी।
दीवाली, राखी और विवाह के अवसरों पर ही वह रंग रोगन कर पाती है खुद का। देर तक नहा कर। बारहमासी बू को धो कर इत्र से सींचती है, कुछ देर। और खो जाती है समारोह में।

Wednesday, 21 September 2016

भारत-पाक युद्ध उन्माद

उरी हमलें के बाद हर तीसरा व्यक्ति या तो हताश है, या हमले और आक्रमण की पैरवी कर रहा हैं। युद्ध की वकालत हो रही है। जानकार कह रहे है की 'जन भावनाओं' को देख कर युद्ध नही लड़े जाते। बात तो ठीक है, मगर ये जनभावना युद्ध की पैरवी ही क्यों कर रही है? अन्य विकल्प क्यों नही सुझा रही! जनता मूल रूप से हिंसक ही होती है, या फिर भारत-पाक नामक फिनोमेना युद्ध के आग्रह का पर्यायवाची है।
बहुत से ऐतिहासिक कारण हैं, जो जनता को युद्ध की वकालत को बाध्य करते है।
मगर फिर भी प्रश्न उठता है, कि हमारा इतिहास बोध इतना जुझारू है वाकई! इतना कि लगभग हर तीसरा व्यक्ति युद्ध की अनिवार्यता को ठान कर बैठ ही जाए ! इतना हिंसक समाज तो नही है हमारा।
कही ऐसा तो नही है कि सरकारों की विफलता को जनता भोग रही है! विभाजन, तीन प्रत्यक्ष युद्ध और निरन्तर चल रहे छद्म युद्ध जनता की सफलता असफलता से इतर पाक नामक मुद्दे को लेकर सरकार की शालीन असफलता का चिह्न बन गया हैं। सरकारों की सफलता उनकी निजी सफलता बन जाती है, मगर उनकी असफलता जनता के लिए अदृश्य बोझ है। और जनता इस बोझ को युद्ध के जरिए उतारना चाहती हैं।
अठ्ठारह जवानों के शहीद होने के बाद जिस युद्ध की कल्पना की जा रही हैं, उसमे और सैनिक शहीद नहीं होंगे ? नागरिक हताहत नही होंगे ? यह विवेक लोग खूब समझते हैं। मगर आप अपने कृत्य पर आप शर्मिंदा नही है, तो बिना गलती किए भी मुझे शर्मिंदा होना पड़ेगा।
सरकारों ने इस फिनोमेन को शर्मिंदगी की हद तक असफल कर दिया है सात दशकों में, चूँकि वो शर्मिंदा नही होती हैं। सो नागरिक शर्मिंदा होकर युद्ध का आग्रह कर रहा हैं।
वह भी जानता हैं की युद्ध किसी समस्या का समाधान नही हैं। मगर यह समस्या है ही नही अब नागरिक के लिए। यह तो शर्मिंदगी से बचने के लिए किया जा रहा आत्मदाह जैसा उन्माद है।

ये जो भारत है

इस देश को छोड़ना कितना मुश्किल है, बात छोड़कर बाहर जाने की नही हैं। इस देश को अखिल रूप से स्मृतियों से बाहर करने की हैं। बहुत कोफ़्त होती हैं, लोगो की तटस्थता और अलसाया हुआ नजरिया देख कर। मगर फिर भी, प्रेम उमड़ आता है इन्ही लोगो पर। आप कितनी भी बौद्धिक प्रगति कर लें, कितनी भी चेतना का विकास कर ले। मगर साधारण से व्यक्ति के सम्पर्क में आते है, तो उसकी श्रम मिश्रित भावुक ग्लानियों में खुद को विद्यार्थी पाते है। बहुत मुश्किल लोग नही रहते भारत में, सरल भी है और टकटकी से चाँद को देखकर चांदनी की आस में रात काटने वाले भी है ये लोग।
बहुत सरल सा जीवन संघर्ष हैं यहाँ, फौरन हथियार डालकर प्रेम करने लग जाते है ये लोग। प्रेम भी ऐसा की एक बार जिसे चाह लिया, बस चाह लिया। बदले में जान देना छोटी चीज है, ये तो आपको अपना डर, अपनी शंका, अपना रुतबा सब दे देते हैं। प्रेम के बदले में।
छोटी सी जिंदगी है, उसी में अद्वैत से लेकर बुद्ध का क्षणिकवाद समझा देते है ये। जी कर स्वयं।

Sunday, 18 September 2016

अजमेर

हर शहर का एक फ्लेवर होता है, एक स्वभाव। स्वभाव जिसे वहाँ का भूगोल, इतिहास और सामाजिक तानाबाना निर्धारित करता है।
अजमेर; इस शहर में आप बांस की भांति रोपे हुए पाते है खुद को। यहाँ का भूगोल , इतिहास और लोक मनोविज्ञान इस तरह गुंथा हुआ है की आप ठीक ठीक किसी आदमी की तरह इसके व्यवहार और सामान्य प्रचालन को भांप सकते है।
बहुत पुराना है अजमेर, बारहवी शती के बाद से यह चर्चाओं में तो रहा। मगर स्थाई रूप से कभी किसी सत्ता की राजधानी नहीं रहा। पहले मुगल, फिर मराठा, और फिर अंग्रेज। सभी ने इसे अपनी सरकार के मुख्यालय के रूप में काम में लिया। यहाँ का स्थाई राजा न हुआ कोई। सो यहाँ के लोगों में नायकत्व के प्रति विशेष राग और लड़खड़ाती हुई उमस दिखेगी। चमत्कारों को यहाँ हाथो हाथ लिया जाता है, किसी चौराहे पर टोटके के अभिमन्त्रित नींबू, टोटम यहाँ आम है। सचिन पायलेट यहाँ से बिना पूर्व प्रयास के चुनाव जीत जाते है।
चूँकि यहाँ राज और सत्ता का स्थाई आवास नही बन सका। ठहराव यहाँ की विशेष भूमिका का मन्त्र है। कोई हलचल नही, बरसो एक ही दूकान से सामान लेने वाले लोग, एक ही रास्ते से जाने वाले लोग थोक में मिलेंगे। मानसिक चरित्र ऐसा की सोफिया से आगे सोचने का विचार उठता ही नही, सेंट जिस स्कूल के आगे लग गया वो बेहतर।
चूँकि प्रशासको ने एक तरफ़ा निर्माण करवाए यहाँ, सो शहर के प्रति उसके इतिहास के प्रति रूचि नगण्य मिलेगी। भारतीय इतिहास को उलट पलट कर देने वाले सैय्यद बन्धुओ का मकबरा है यहाँ ; अब्दुल्ला खान का। पर जानता कौन है इधर। मेंयो कॉलेज यहाँ के लोगो के लिए स्वप्न है, स्वप्न के भीतर स्वप्न है। सो लोककथाए बन जाती है आपे आप ; बॉबी देवल अपनी बहन को संभालने मेयो आया और सिगरेट खरीदने अमुक दूकान पर गया। जब बरसात फ़िल्म आई तो दुकानदार ने कहा ये लड़का मेरे यहाँ सिगरेट फूंकने आता था।
नागौर, टोंक, भीलवाड़ा जिलो से सटा है अजमेर( पाली से भी) मगर संस्कृतियों का संक्रमण नही हो पाया। सो शहर दो धड़ो में विभक्त हो चला है, वैशाली नगर की तरफ सभ्रांत वर्ग का निवास माना जाता है। बाकी गुजर धरती जैसे मोहल्ले भी है जो शहर के भीतर गाँव का लुक डेते है।
बाहरी पर्यवेक्षक आसानी से कह सकता है की यह थका हुआ उबासी लेता शहर है। रिटायरमेंट काटने के लिए मुफीद। मॉल , सिनेमाहाल आपको अपडेट होने से नाराज दिखेंगे। लड़कियाँ जिंस में खुद को सहज नही पाती है अधिकतर, उनके लिए लम्बा काजल लगाना चरम अभिव्यक्ति की तरह हैं। कहने को शिक्षा नगरी है, लडकिया आज भी प्ले स्कूल में 800 रुपये तनख्वाह में पढ़ाती मिल जाएगी।
बंधी हुई ऊर्जा का शहर, नीरवता का निशान।
होते है , ऐसे शहर भी।
'एक शहर'

डर

खिलजी साम्राज्य पढ़ाते हुए, यूँ सन्दर्भों में 'डर' का जिक्र आ गया। मैंने एक एक से पूछा की उनका सबसे बड़ा डर क्या हैं।
आश्चर्य अधिकतर लड़कियों ने कहा 'अँधेरा' व 'इन्सल्ट'
एक बात बताइए लड़की जो अपने ही घर में रह रही हैं, उसे कौन संकेत कर रहा है की अँधेरे और इन्सल्ट से डरना चाहिए। हम और हमारा परिवेश।
ज्यादा गहरा नहीं जाते हैं, आप जानते है की अँधेरे और इन्सल्ट से डरने के मायने क्या होते है। बात यह है कि,
आप इस पोस्ट को पढ़ रहे है और अविवाहित लड़की है, तो याद रख लीजिए अँधेरे और इन्सल्ट से डरना आपके खून में नही हैं। ऐसा आपको सिखाया गया है आपकी परवरिश के दौरान। और यह दोनों डर आपको जीवन भर अलग अलग रूपों में डराएंगे। चादर को उठाना शुरू कीजिए, जो परिवेश आपको अँधेरे और इन्सल्ट से डरना सिखा रहा है, उसे वापस लौटा दीजिए ये दोनों डर।
अगर आप शादीशुदा है, बच्चे है आपके। ध्यान दीजिए अपनी बेटी को अँधेरे और इन्सल्ट से मत डराइये, मुझसे पूछिए जब वे कह रही थी की उन्हें इन चीजो से डर लगता है। तो उनके चेहरे पर शैतान की छाया थी। अपनी बेटियों पर से ये छाया उठा लीजिए प्लीज, वरना अँधेरा और इन्सल्ट हर जगह उन्हें मारेगा। तोड़ेगा।

दाना माँझी

दाना मांझी की इन तस्वीरों को देख कर लगा कि मुझ जैसे बहुत से लोगों को खबरे पढ़ना बन्द कर देना चाहिए। कम जानकारी भी स्वास्थ्य के लिए बहुत हद तक ठीक रहती हैं।
दाना अपनी पत्नी की लाश को उठाए घर आ गया, और हिन्द महासागर में एक जलजला उठा। हाय हाय के नारों से चौंक उठा वातावरण। फिर क्या हुआ आगे।
दाना को प्लेन का टिकट मिला, वह दिल्ली आया और बहरीन के राजदूत ने बहरीन सुलतान की ओर से 9 लाख रुपये भेंट किए। वह वापस आ गया, पूछा तो बताया की बेटियों को पढ़ा कर इंसान बनाएगा। सही बात है, पत्नी की मौत के बाद मिले पैसों से आदमी डोनेशन की सीट तो नही खरीद सकता। पग पग शर्मसार होती इंसानियत के खातिर वह कम से कम अपनी बेटियों को इंसान बनाने का संकल्प तो ले ही सकता हैं।
कभी विचार आता है, क्या हो गया आदमियत को। क्या इंसान बनने का ठेका छोटे आदमी के नाम ही छूटता है हमेशा! कैलाश खैर का एक गीत है- तेरी दीवानी। गीत में तीन चार कहानियां समानांतर चलती हैं। जब ट्रक में बैठकर एक प्रेमिका जाती हुई दिखती है, तो उसका साधारण सा दिखने वाला प्रेमी उसे देखता भर रह जाता है। उसकी आँखों में उचटती उदासी है। ठीक इस सीन के पास दूजा सीन यह की एक मुस्लिम प्रेमी अपनी प्रेमिका की तरफ चाकू ले कर बढ़ता है। और ट्रक वाला प्रेमी थोड़ी दूर तक भागने की कोशिश करता हैं। दोनों कहानियां अलग अलग है, मगर लगता है जैसे अपनी प्रेमिका से बिछड़ा हुआ आदमी, किसी दूसरी प्रेमिका को चाकू के हमले से बचाने के लिए दौड़ना चाहता हैं।
दाना ,आप और मैं। हमारी कहानियां समानांतर है, दाना की प्रेयसी मर चुकी है। और हम अपनी प्रिय सम्वेदनाओं के प्रयासरत हत्यारें बने बैठे है।दाना की प्रेमिका को हम बचा नही सके, सो अब दाना स्वयं ही दशरथ मांझी की तरह हमारे मन का पहाड़ तोड़ कर अपनी बेटियो को इंसान बनाना चाहता है। ताकि वे किसी के प्रेम को बचाने के लिए दौड़ सके।
ये दलित आदिवासी क्यों है। हम सभ्रांत है इसलिए। जिस दिन ये दलित और आदिवासी नही रहेंगे, हम उससे पहले खत्म हो चुके होंगे। इस बार तो दाना माँझी का संकल्प मनुष्यता को बचा रहा हैं। अगली बार क्या होगा , कह नही सकते।

Thursday, 26 May 2016

सनातन हिन्दू धर्म और हिंदुत्व

सनातनी हिन्दू धर्म का राजनीतिक संस्करण; हिंदुत्व असल में प्रतिक्रियावादी हिंसक संस्करण है। जिसका अंतिम लक्ष्य लोगों को मुर्ख बना कर कट्टरपंथी बनाना है । हिन्दू धर्म की जड़े यही हिंदुत्व खोद रहा है । गले में केसरिया मफलर डाल कर हिन्दू धर्म की रक्षा करने निकले लोग भूल जाते है की असल में वे एक कट्टरपंथी राजनीतिक दर्शन की रक्षार्थ जुटे है ।
हिन्दू होने के लिए सिंधु का पानी पीना पड़ता है, खून नहीं ।

मिर्ची का भाव

खबर है की महाराष्ट्र में एक टन प्याज बेचकर किसान को एक रुपया मुनाफा मिला बस ।
बात उन दिनों की है जब हमनें मिर्च लगाई थी खेत में । पहला तोड़ निकला आठ बोरी , दिन भर मिर्च तोड़ कर शाम को निजी मण्डी में पहुँचे तो भाव मिला बाइस रुपये किलो के हिसाब से । हम कोई पाँच सात लोग थे अलग अलग खेतों वाले । भाव सुनकर बहुत खुश हुए , और मिर्च तुलवा दी । एक एक व्यक्ति को पाँच से सात हजार रुपये मिले उस रात । पैसा गिन कर जेब में रखा और साथ वाले किसान लड़कों ने बीयर पी उस रात । घर लौटे और दुगुनी मेहनत और उम्मीद से अगले तोड़ में लग गए । दस बारह दिन बाद पिछली आठ बोरी की तुलना में इस बार तोड़ बैठा बाइस बोरी का । साथ वालों का भी ठीक ही बैठा । इस बार हमारी मिर्च की बोरियाँ एक की जगह दो ट्रेक्टर में लद कर गई । हाईवे के गाँवों में सड़क पर ही प्राइवेट मण्डियां लगती थी , पहली मण्डी पहुँचे तो भाव लग रहा था इस बार सिर्फ बारह रुपये किलो । किसी ने बताया अगली मण्डी में बीस चल रहा है , पहुँचे तो पता लगा सुबह बीस था । अभी माँग में कमी है सो आठ रुपये का भाव है । अजमेर मण्डी की मांग आनी बाकी थी सो अगली मण्डी वाले ने फोन पर बताया की आ जाओं दस तो लग ही जायेगा । हम तीसरी मण्डी पहुंचे । पिछली दोनों मण्डियों में एक बार फिर फोन लगाया रास्ते में से तो पता लगा की भाव उतर कर पाँच रुपये किलो रह गया है । तीसरी मण्डी पहुँचे डरते डरते । अजमेर मण्डी से कोई मांग न आई थी । हमें मिर्च तुलवानी पड़ी डेढ रुपये किलो में । कुल बारह सौ रुपये लेकर घर लौटे , उस रात साथ वाले किसानों ने खेत से निकलते वक्त बीयर पीने की योजना बनाई थी । मुझे याद है , लौटते लौटते हमे एक बज गया था , रास्ते भर एक आदमी न बोला , सब चुप चाप ट्रोली में बैठे पता नहीं क्या सोच रहे थे ।
संयोग से अगले दिन कस्बे में ठेले वाले से मिर्ची ली पाव भर आठ रुपये की , यानि बत्तीस रुपये किलो भाव में । बीच के साढ़े तीस रुपये कहाँ गए होंगे मैं नहीं जानता !

खुदाई खिदमतगार

भारत में एक चेतना लोक चेतना का हिस्सा किस तरह बनती है । किस तरह भूगोल हमारे मानसिक भूगोल को प्रभावित करता है । खैबर दर्रे के नजदीक वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र में खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म हुआ । आश्चर्य की इस क्षेत्र को सदियों से बेहद अस्थिर माना जाता है और इस क्षेत्र के लोग भयंकर किस्म के लड़ाके रहे है , खुद खान का डील डौल मध्यकालीन कबायली युद्धा सा था मगर बादशाह खान ने बच्चा खान हो कर अहिंसा और सत्याग्रह को दिल से लगाया । आजीवन गाँधी के साथ पैदल चले और जब विभाजन के बाद उन्ही के शब्दों में उन्हें ' भेडियो के सामने फैंक दिया गया' तो भी पाक जाकर वे निरंतर सत्ता से लड़े । जीवन जेलों में बीता । मृत्यु के बाद अफगानिस्तान में दफनाया गया तो , जिस खैबर दर्रे से आक्रमणकारी आते थे उस दर्रे से शांति दूत के पक्ष में रैली की तरह लोग सम्वेदनायें प्रकट करने अफगान इलाके में गए । इस दौरान रूस ने सीज फायर घोषित किया और बच्चा खान बच्चों की तरह न किसी मुल्क की शास्ति रहे न सीमा में बंधे रहे । आगे देखिये , खुदा गवाह का अमिताभ , जंजीर का प्राण शेर खान हमारी चेतना की जंजीर की अहम् कड़िया है । ये चरित्र मुम्बई के डॉन हाजी मस्तान से प्रेरित है । और हाजी मस्तान की प्रेरणा खान अब्दुल गफ्फार खान थे । खां साहब ने ही खुदाई खिदमतगार के झंडे तले 'पख्तून जिर्गा ऐ हिन्द ' नामक संगठन की स्थापना करके हाजी मस्तान को लोगो के हक़ में बात उठाने को प्रेरित किया था । हाजी पहले पहल अफगानों का नेतृत्व करता रहा बाद में उसका मुम्बई दरबार ( सनी देवल के देवा की अदालत की तरह  -जिद्दी फ़िल्म ) सभी के लिए खुल गया । हो सकता है यह गांधी के सर्वोदय से आंशिक प्रभावित हो ।
जब खैबर खुद खैबर न रहे , बादशाह खान बच्चा खान हो जाने लगे , गांधी का अनुयायी  और साथी अंतिम समय तक जेल जाने से न घबराये , एक डॉन जनता दरबार लगाने लग जाए , और फिल्मो का शेर खान दोस्ती की कसम लगे । भारत की सामूहिक चेतना खैबर के दर्रे से निकल कर फिल्मो की श्रृंखला के बीच कही बह रही है । इसे गाँधी हवा देते है और खान साहब जी लेते है ।

Friday, 20 May 2016

हलधर नाग : तारा जमीन पर

पद्म पुरस्कार लेते वक्त हलधर नाग नंगे पैर थे । बहुत सम्भव है कि इस तस्वीर को देखकर आप का जी कुछ देर के लिए वर्तमान काल खण्ड से उचट जाये । फिर आपका खुद के जीवन से भी मन उचट जाए और तत्पश्चात आपका अहम् अपनी तुष्टि के लिए हलधर नाग की शिष्टता में बाबा आम्टे या अपने दादा को देखने लगे । इस आशा में कि आप इस शख्स के व्यक्तित्व से रिलीज़ हो सकें ।

सच कुछ और है । कमर से टाइट जींस और सरकार की आलोचना ने हमें जकड़ लिया है । इस मुल्क की सच्चाई गॉवों की पगडंडियों से होते हुए वहाँ के सामाजिक तानेबाने में रची है । हलधर की कविताओं में औरत की आजादी का आह्वान उसके आंसुओं और समस्याओं में है । जिसे वो कस्बे कस्बे जा कर गाते है । इनकी कविताओं में जातिभेद का दुःख आरक्षण को निशाने पर लेकर चुप नहीं होता । वह दुःख रोजमर्रा का संघर्ष है जो निरन्तर घटित होता है , जिसे हलधर सिर्फ बयान करते है । सामाजिक वितन्डो को वे यथास्थिति में कहते है - जिसे अपना लगे वो हँस दे या रो दे । इसीलिए वे जनकवि है उड़ीसा की कोसली भाषा के । लोगो की बात लोगो की जबान में कह देने से लोगो को लड़ने का हौंसला मिलता है । एक जनांदोलन की तैयारी इसी तरह होती है ।

हलधर का पहनावा कहता है की वे बेहद सामान्य श्रेणी से उठकर आये है । लेकिन पेट दिखाकर आपकी सम्वेदना नहीं जगाऊंगा । बस यह कि, वे तीसरी कक्षा तक पढ़े है मगर अपनी जन आवाज से कई स्कॉलरों को अपनी कविताओं पर रिसर्च करने के लिए आकर्षित करते है ।

हमारी परम्परा राष्ट्रपति भवन पर नंगे पैर पहुंची है । सामाजिक मुद्दों की बाते देसी आवाज में लोगो तक गई है । हमे देखना होगा की जिस तरह का जीवन हम जी रहे है वह बहुत हद तक सच नहीं है । कन्धे पर हल धर कर आज जो लोग सुदूर कोनों में रहते है । हलधर उनका ही जीवन कहते है ।

जब किसान मरता है

किसान आत्महत्या करता है तो एक पूरा तंत्र मरता है । किसान की पत्नी कर्ज चुकाने के लिए या तो पशुओं को बेच कर या जमीन बेच कर उधार चुकाने का इंतजाम करती है । क्योंकि किसान के मरने से कर्जा माफ नहीं होता , उल्टे रकम चुकाने का दबाव ज्यादा बढ़ जाता है । किसान को रोने आने वाले लोग , रिश्तेदार और महाजन तीये की बैठक के बाद से ही अपने पैसे के डूब जाने के डर से अपने अपने तरीके से दबाव बना जाते है ।

किसान का पुत्र उम्र में कम हो या बालिग हो , उसका भविष्य नए रूप में निर्धारित होता है । पढाई करना अब उसके बस में नहीं होता । अब उसे घर का सामाजिक और आर्थिक नेतृत्व करना होता है । अपने बाप के हिस्से का दर्द अब उसे झेलना है , निरंतर ।

किसान की बेटी को लोगो को यह विश्वास दिलवाना है अब की उसके पिता दिवालिया होने के डर से नहीं मरे है । उसका भाई बैंक, महाजन और रिश्तेदारों का एक एक रूपया लौटाएगा ।

किसान के बैल, गाय , भैंस , बकरियाँ या तो बिकने के लिए इन्तज़ार करते है या कटने के लिए । आर्थिक तंगी से जूझता हुआ परिवार मृत्यु उपरान्त किए जाने वाले सामाजिक क्रियाकर्मो के लिए इन्हें ही बेच कर पूँजी जुटाएगा ।

घर का बड़ा सदस्य अब नहीं है , घरेलू जायदाद के मसले , खेत के सीमांकन की ग्रामीण समस्या, खेत मे पानी लाने के मौखिक समझौते सब अबसे नए सिरे से परिभाषित होने है । यह बोझ या तो किसान की पत्नी को ढोना है या बड़े लड़के को ।

सच यह है की आत्महत्या के वक्त किसान जब  फंदा फांद रहा होता है , समानांतर रूप से एक अदृश्य फंदा उसके बच्चों , परिवार और पशुओं के लिए भी कसा जा रहा होता है ।

किसान अपनी मृत्यु  चुन लेता है , सिस्टम उसके परिवार को जिन्दा मारता है फिर रोज , बरसों तक । मृत्यु भी उन्हें चुनने से मना कर देती है ।

लातूर का नमकीन पानी

बंगाल में कम्पनी सरकार का राज हुआ, बीस साल भी न बीते थे बक्सर की लड़ाई को और दुर्भिक्ष पड़ा, खुद अंग्रेज अफसरों ने ब्रिटेन पत्र लिखे कि इस मुल्क को हमनें इस हद तक बर्बाद कर दिया है कि बंगाल के अकाल में कुछ जगह पर लोगों ने मानव माँस खा कर जीवन बचाया है|

राज बदला , तो लगा खुद कि लोग खुद के लोगो से सम्वेदना रखेंगे , साथ गम बाटेंगे । स्वराज आएगा । स्वराज आने के लिए रवाना तो हुआ , मगर बीच रास्ते में ही रुक गया । लातूर तक नही पहुँच पाया । लातूर की ही बात नहीं है , राजस्थान में तो हर दूसरे बरस अकाल पड़ता है । कितनी हास्यास्पद बात है , नेशनल ग्रिड बन रहा है , ताकि बिजली का न्यायपूर्ण बँटवारा हो सके । बिजली न आएगी तो पसीना निकलेगा । मगर पानी नहीं होगा तो अर्थी उठेगी, जनाजा निकेलगा । विकास की किताब में बिजली के पन्ने के बाद पानी का पन्ना क्यों नहीं है । शहर के चेप्टर के बाद गाँव का चेप्टर क्यों नहीं है ।

कभी नहीं रखा गया , आज भी कोई नहीं रख रहा ।सत्ता सेल्फ और सेल्फ़ी में मग्न है |
प्रशासन उनके ट्विटर हैंडल हैंडल कर रहा है । कुछ आँखों का पानी सूख गया है , कुछ का रुकने का नाम नहीं ले रहा है ।

मीठा और आँखों का नमकीन पानी दोनों एक दूसरें छोर पर खड़े होकर एक दूसरें का इंतजार कर रहे है ।

जाति कभी नही जाती

जाति का मनोविज्ञान और व्यक्तित्व पर प्रभाव बहुत सूक्ष्म और मारक होता है । मेरा विश्वास कीजिए आप राजपूत हैं, और अगर हरिजन होते तो आपका यही व्यक्तित्व नितांत भिन्न होता । आप मोची हैं, और अगर ब्राह्मण होते तो यही आपका व्यक्तित्व भिन्न दिशा में यात्रा करता पाया जाता । एक और बात यह कि क्या कोई जातिवाद से मुक्त हो सकता है ?  जाति के प्रभाव से मुक्त होना अत्यंत विरल घटना है । जातिगत प्रभाव पुरुष को फिर भी थोड़ी ढील दे देते हैं , स्त्री का तो जीवन ही बदल देते है । एक ही कक्षा में पढ़े चार लड़के जो ब्राह्मण, राजपूत, बनिया, चमार हैं ।  पचास साल बाद उनका जीवन तौलिए । और ऐसी ही चार लड़कियों का जीवन तौलिए । स्त्री ज्यादा संकट में दिखेगी । स्वास्थ्य, जीवन शैली, मानसिक शांति जैसे विभिन्न पहलुओं के सापेक्ष ।
'जाति कभी नही जाती'

भूमि अधिग्रहण का बहुरूपिया

एक पाँव में घुँगरू पहने बहुरुपिये के एक हाथ में लकड़ी होती है । जिसपर पायजेब की तरह के घुँघरू बंधे होते है । उसका चेहरा पुता हुआ और आँखे हल्की सी काजल से ढँकी होती है । घुटनों तक के वस्र और बाल लम्बे से ।
ऐसा क्या हुलिया है , की गाँव के बच्चे डर और कौतुहल में इसके पीछे चल देते है । बहुरूपिया भी आँखों की कोरों से बच्चों की भीड़ की चौड़ाई नापता हुआ आगे बढ़ता है धीरे धीरे , गाँव के बुजुर्ग बच्चों को डाँटते हुए आगे बढ़ते है की नाहक ही भीड़ लगाईं हुई है । बहुरूपिया गाँव से बिना खाना -पैसा माँगे गाँव पार कर जाता है । गाँव के बाहर के कुएँ पर बैठकर वह बीड़ी सुलगाता है । अपने सामान ठीक करता है और चुपचाप ,धीरे धीरे बच्चों की संख्या भी गिन रहा होता है । बच्चें थोड़ा डरे से ,थोड़ी शंका में , थोड़े जिज्ञासु से उसके आस-पास खड़े होते है घेरा बना कर । फिर बहुरूपया उन्हें भगा देता है ।
बच्चे गाँव पार करते हुए घरों लौट आते है । सारा हाल घर वालो को कह सुनाते है ।
घर वाले उन यादों में डूब जाते है कुछ क्षणों के लिए , जब वे भी ऐसा ही करते थे । और बताते है की वो फिर आएगा और रोटी-पैसा मांग कर ले जाएगा गाँव में से , उसका बच्चों को घर और गांव से बाहर ले जाना ही उसका खेल और कला है ।
पूंजीवाद ने गाँवों में ऐसे ही प्रवेश किया था कभी । उसके एक पाँव में आधुनिकता का घुँगरू था ,और हाथ में आजादी की लकड़ी जिसपर प्रेम का घुँगरू पायजेब की तरह लटका था । कारखाने में काम करने की वजह से पेंट घुटनो तक चढ़ी थी , और आँखों में फैक्ट्री के काले धुँए का काजल था । उसके अर्ध-पूर्ण,  अर्ध-स्वतंत्र और आधे बंधे हुए अस्तित्व के पीछे नए लोग बौरा गए । गाँव के बाहर सुस्ताते हुए उसने सामान खोल कर बीड़ी जलाई और बताने की चेष्टा की कि वह भी जीवन को धुएं में उड़ाना चाहता है । मगर उड़ा नहीं पाया , उड़ा नहीं पा रहा । वह शहर आ कर लोगों को बसनें से पहले चेता कर घर वापस भगा देना चाहता है , मगर लोग नहीं मानते ।
जिस दिन शहरों से निकलकर , लोग बच्चा होकर फिर से घर लौटेंगे । पूंजीवाद की कथा कहेंगे । घरवाले बहुरुपिये को याद करेंगे कुछ क्षणों के लिए  ।
अब वह गाँव में लौटेगा , रोटी - पैसा मांगने के लिए । भूमिअधिग्रहण का रूप धर कर ।