पिता को पुत्री ने लिखा।
प्रिय पिताजी,
आप कितने प्रिय है, बता नही सकती। न ये बता पाती हूँ की आप क्या है मेरे लिए।
आप जब नौकरी पर चले जाते थे मैं स्कूल से आते वक्त, समारोहों में नाचते समय और पढाई से थक कर किताब बन्द करते हुए आपके संघर्ष को जीती थी। हमेशा सोचती थी, मेरे पिता का दुःख मेरे ऊपर से गुजरकर सुख में तब्दील हो जाना है एक दिन। समय और भविष्य से मेरी लड़ाई में आप मेरी ताकत भी थे और थकान का सहारा भी।
पिताजी, अब भी सोचती हूँ की कभी लड़कियो से शौक नही किए तो क्या! पिता जी जिंदगी जी कर खुद को उन्नत तो किया हैं।
पर मैं प्रेम नही कर पाई, आपने किया था कभी। कभी पहले। हम दोनों एक से निकले, समय की भागदौड़ में न प्रेम आपको खोज पाया न मुझे पकड़ पाया। मेरी कई सहेलियाँ मुझे चिढ़ाती थी बाईजी कह कर। पर मेरे पास अदृश्य जिम्मेदारी का बोझ और पिता की इज्जत का डर था। नही किया सो नही किया।
कल भी किसी से सस्नेह बात कर ली, तो अपराध बोध से भर गई। कही पिता बुरा न मान ले। रात आँखों में कटी और आँखे आँसुओ से कटती रही। पिताजी, बात कीजिए न मुझसे।कि मेरी उम्र के अपराध मेरे हिस्से में न लिखेगा ईश्वर। कहिए न कि मैंने जवानी में बुढ़ापा जिया है।
मुक्त कीजिये न मुझे इस डर से, कि मेरा जीवन मेंरा नही है। बताइये कि ये मेरा ही है।
मेरे सर पर हाथ रख कर मन्त्र पढ़ दीजिये आज,मेरी स्वतन्त्रता का। जीवन को जी लेने का। फाड़ दीजिये वो सारे अपराधपत्र जो मैंने खुद को लिखे थे कल रात।
जानते है न , आपको निराश नही करूँगी।
ये आप ही जान सकते है, आप ही कर सकते है।
मैं इंतज़ार कर रही हूँ आपकी बात का।
आपकी
बेटी
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Saturday, 19 November 2016
पिता को पुत्री ने लिखा
Tuesday, 27 September 2016
पिंक फिल्म के बहाने औरत का स्पेक्ट्रम
क्या पिंक नाम की फिल्म पर बिना फिल्म देखें ही समीक्षात्मक टिप्पणी की जा सकती है . हाँ , क्यों नहीं. फिल्म, पिंक,और महिला को हम जानते ही है . और अगर पिंक भारतीय महिलाओं पर प्रकाश डालती है, तो बेशक टिप्पणी की जा सकती हैं .
सोचता हूँ, इस फिल्म का नाम 'पिंक' क्यों रखा गया है . क्या इसलिए कि 'ब्लू' भी फिल्म ही होती है , और वह भी महिलाओं को केंद्र में रख कर ही बनाई जाती है . इस लिहाज से ही 'ब्लेक' नामक फिल्म भी महिला पर बनाई गई थी. संयोग से अमिताभ बच्चन साहब ब्लेक में भी मुख्य भूमिका में रहे थे .
'पिंक' तो नहीं देखी , मगर 'ब्लू' देखी है और अमिताभ को भी देखा है कई फिल्मो में . सवाल यह है की महिलाओ को केंद्र में रख कर बनाई फिल्में रंगों के नाम पर क्यों बनाई जा रही है. क्या इंसान की नियति रंग देखना महिलाओ के सहयोग से ही संभव है. हमारी माएँ , बहनें, पत्नियाँ, प्रेमिकाएँ रंगों का इन्द्रधनुष है क्या ? और अगर है, तो फिर अलग अलग रंगों से क्यों संकेत करते रहते है हम.
विज्ञान में 'स्पेक्ट्रम' नाम का एक फिनोमेना पढ़ा जाता है. प्रकाश को प्रिज्म से गुजारने पर प्रकाश सात रंगों में बंट जाता है. बैंगनी रंग सबसे नीचे रहता है और लाल रंग सबसे ऊपर होता है इस इन्द्रधनुषी स्पेक्ट्रम में. गहरा नीला सबसे नीचे रहता है, इसीलिए हम 'ब्लू' फिल्म को सबसे कमजोर दर्जा देते है क्या ? और लाल रंग सबसे ऊपर होता है, क्या क्रांति और महिला की स्वतंत्रता इसीलिए हमारे मष्तिष्क के स्पेक्ट्रम से बाहर है. हम डरते है शायद औरत की स्वतंत्रता से. सो ब्लू फिल्म बना कर उसकी देह पर अधिकार करके उसे लाल रंग तक यात्रा करने ही नहीं देना चाहते.
विज्ञान में एक और फिनोमेना पढ़ा जाता है. ;ब्लू शिफ्टिंग' और 'रेड शिफ्टिंग' . ब्रह्मांड को पढ़ते समय ये दोनों फिनोमेना खूब पढ़े जाते है; अगर किसी तारे से आ रही उर्जा नीले स्पेक्ट्रम की और शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे नजदीक है . और किसी तारे से आ रही प्रकाश उर्जा लाल रंग के स्पेक्ट्रम की ओर शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे बड़ी तेजी से दूर भाग रहा है .
औरत वही तारा है जो ब्रह्मांड में हमसे दूर जा रहा है . रेड शिफ्टिंग से बचने के लिए हम 'ब्लू' फिल्म का सहारा लेकर उसे कैद करना चाह रहे है. मगर कब तक सम्भव है ! रेड शिफ्टिंग से इंसानियत कब तक बचती रहेगी, मुहँ छिपाती रहेगी, भागती रहेगी .
स्पेक्ट्रम में 'पिंक' रंग नही है . मगर फिल्म का नाम है पिंक. हो सकता है औरत के लिए अपना प्रकाश और उर्जा तैयार करने की दिशा में निर्देशक नैतिक बल प्राप्त करने में खुद को कमजोर देखता हो सो वह लाल की जगह पिंक रंग के लिए ही स्थान खोज पाया हो.
अमिताभ ने 'ब्लेक' से 'पिंक' का सफ़र औरत के साथ किया है. रेखा की स्मृति, यादें, उसकी उदास तन्हाई, अमिताभ के प्रति समर्पित भूतकाल. अमिताभ ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को उन स्मृतियों के कारण तो नहीं भर रहे है कही ? भरे , कोई दिक्कत नहीं है .
आम आदमी को इस स्मृति को भरने का साधन नहीं होना है .जीवन में रेखा रही हो या नहीं हो . कम से कम हम तो ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को रोक सकते है . हमे प्रिज्म से गुजरती स्त्री और बिखर कर रंगों में टूटती स्त्री को स्पेक्ट्रम होने से रोकना चाहिए . गाँधी कहते थे , सत्याग्रह स्त्री के चरित्र और व्यवहार के अधिक नजदीक है. बताइए, स्त्री के जिस प्रकाश ने अंग्रेजो के सूरज को डुबो दिया. वह प्रकाश हमारे जीवन में कितने सूरज उगा सकता है . ब्लू ,ब्लेक,पिंक के रूप में स्त्री को क्यों देखते है . एक बार मन से उसके प्रकाश को प्रिज्म से गुजरने से रोकिए. यूँ ही मूल रूप से अहसास कीजिए .
रंगीन हो जाएगी जिन्दगी . इसलिए ही तो सारी दौड़ भाग रहे है हम.
सोचता हूँ, इस फिल्म का नाम 'पिंक' क्यों रखा गया है . क्या इसलिए कि 'ब्लू' भी फिल्म ही होती है , और वह भी महिलाओं को केंद्र में रख कर ही बनाई जाती है . इस लिहाज से ही 'ब्लेक' नामक फिल्म भी महिला पर बनाई गई थी. संयोग से अमिताभ बच्चन साहब ब्लेक में भी मुख्य भूमिका में रहे थे .
'पिंक' तो नहीं देखी , मगर 'ब्लू' देखी है और अमिताभ को भी देखा है कई फिल्मो में . सवाल यह है की महिलाओ को केंद्र में रख कर बनाई फिल्में रंगों के नाम पर क्यों बनाई जा रही है. क्या इंसान की नियति रंग देखना महिलाओ के सहयोग से ही संभव है. हमारी माएँ , बहनें, पत्नियाँ, प्रेमिकाएँ रंगों का इन्द्रधनुष है क्या ? और अगर है, तो फिर अलग अलग रंगों से क्यों संकेत करते रहते है हम.
विज्ञान में 'स्पेक्ट्रम' नाम का एक फिनोमेना पढ़ा जाता है. प्रकाश को प्रिज्म से गुजारने पर प्रकाश सात रंगों में बंट जाता है. बैंगनी रंग सबसे नीचे रहता है और लाल रंग सबसे ऊपर होता है इस इन्द्रधनुषी स्पेक्ट्रम में. गहरा नीला सबसे नीचे रहता है, इसीलिए हम 'ब्लू' फिल्म को सबसे कमजोर दर्जा देते है क्या ? और लाल रंग सबसे ऊपर होता है, क्या क्रांति और महिला की स्वतंत्रता इसीलिए हमारे मष्तिष्क के स्पेक्ट्रम से बाहर है. हम डरते है शायद औरत की स्वतंत्रता से. सो ब्लू फिल्म बना कर उसकी देह पर अधिकार करके उसे लाल रंग तक यात्रा करने ही नहीं देना चाहते.
विज्ञान में एक और फिनोमेना पढ़ा जाता है. ;ब्लू शिफ्टिंग' और 'रेड शिफ्टिंग' . ब्रह्मांड को पढ़ते समय ये दोनों फिनोमेना खूब पढ़े जाते है; अगर किसी तारे से आ रही उर्जा नीले स्पेक्ट्रम की और शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे नजदीक है . और किसी तारे से आ रही प्रकाश उर्जा लाल रंग के स्पेक्ट्रम की ओर शिफ्ट हो रही है तो वह तारा हमसे बड़ी तेजी से दूर भाग रहा है .
औरत वही तारा है जो ब्रह्मांड में हमसे दूर जा रहा है . रेड शिफ्टिंग से बचने के लिए हम 'ब्लू' फिल्म का सहारा लेकर उसे कैद करना चाह रहे है. मगर कब तक सम्भव है ! रेड शिफ्टिंग से इंसानियत कब तक बचती रहेगी, मुहँ छिपाती रहेगी, भागती रहेगी .
स्पेक्ट्रम में 'पिंक' रंग नही है . मगर फिल्म का नाम है पिंक. हो सकता है औरत के लिए अपना प्रकाश और उर्जा तैयार करने की दिशा में निर्देशक नैतिक बल प्राप्त करने में खुद को कमजोर देखता हो सो वह लाल की जगह पिंक रंग के लिए ही स्थान खोज पाया हो.
अमिताभ ने 'ब्लेक' से 'पिंक' का सफ़र औरत के साथ किया है. रेखा की स्मृति, यादें, उसकी उदास तन्हाई, अमिताभ के प्रति समर्पित भूतकाल. अमिताभ ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को उन स्मृतियों के कारण तो नहीं भर रहे है कही ? भरे , कोई दिक्कत नहीं है .
आम आदमी को इस स्मृति को भरने का साधन नहीं होना है .जीवन में रेखा रही हो या नहीं हो . कम से कम हम तो ब्लेक से पिंक तक के सफ़र को रोक सकते है . हमे प्रिज्म से गुजरती स्त्री और बिखर कर रंगों में टूटती स्त्री को स्पेक्ट्रम होने से रोकना चाहिए . गाँधी कहते थे , सत्याग्रह स्त्री के चरित्र और व्यवहार के अधिक नजदीक है. बताइए, स्त्री के जिस प्रकाश ने अंग्रेजो के सूरज को डुबो दिया. वह प्रकाश हमारे जीवन में कितने सूरज उगा सकता है . ब्लू ,ब्लेक,पिंक के रूप में स्त्री को क्यों देखते है . एक बार मन से उसके प्रकाश को प्रिज्म से गुजरने से रोकिए. यूँ ही मूल रूप से अहसास कीजिए .
रंगीन हो जाएगी जिन्दगी . इसलिए ही तो सारी दौड़ भाग रहे है हम.
Tuesday, 1 December 2015
स्त्री : अधिकारी और अधिकारों के बीच
क्यों है ऐसा ? की , गाँव में औरत 'स्पेशल स्टेट्स ' भोग रही है . विशेष वाला स्पेशल स्टेटस नहीं , बल्कि 'अलग ' वाला स्पेशल स्टेटस ! यह लैंगिक असमानता का मसला नहीं है , औरत के औरत होने को लेकर दृष्टिकोण का मामला है . आज गाँव में लड़की पढ़ रही है , साइकिल चला कर अपनी दुरी भी तय कर रही है , मगर साथ में अपने लड़की होने का बोझ भी ढो रही है . समाज ने अपने नजरिए को विस्तृत नहीं किया है - उसे स्कुल भेजकर , साइकिल दिलवा कर . बल्कि उसे औजार की तरह काम में लिया है . जैसा की वह अब तक करता आया है . यह समाज के अभ्यास की ही सफलता है , जो औरत को खेती में काम लेता है , और उसे शारीरिक तौर पर कमजोर भी कहता है (हिप्पोक्रेसी ! ) और जब शिक्षा में खुलापन आया तो समाज ने औरत को अपने हिसाब से कस्टमाइज़ करने की कोशिश की है . कैसे ? पढ़ा लिखा कर अधिकतर लोग क्या करवाना चाहते है अपनी लड़की से ? नौकरी ? नहीं , सभी ऐसा नहीं चाहते है . बड़ा तबका इस लिए शिक्षा का दरवाजा लड़कियों के लिए खोलने को मजबूर हुआ , क्यूंकि विवाह के लिए प्रतियोगिता बढ़ी है . अपनी लड़की पढ़ेगी नहीं , तो विवाह मुश्किल होगा .
इस तथ्य को ठीक से जानने के लिए आप को देखना होगा की , विवाह के बाद उस पढाई के प्रति लड़की के अभिभावक का क्या रुझान रहता है . क्या वह वार पक्ष पर यह जिम्मेदारी डालता है की हमने एम.ए . पास करवा दी है अपनी लड़की को आप डॉक्टरेट करवाइएगा , या नौकरी के लिए उसे समय - संसाधन उपलब्ध करवाइएगा . नहीं ! सामान्य समूह कहता है - आप की हुई अब , आप चाहे तो पढ़ाइये आप चाहे तो नौकरी करवाइये ,आप चाहे तो घरेलू काम काज करवाइये . विवाह के लिए जो प्रतियोगिता थी असल में , वही पास करना लड़की का चरम लक्ष्य था - और वह सफल हुई . बस
स्त्री धन है , पूँजी है , वह इंसान नहीं है , जिस तरह धन का व्यक्तिगत अधिकारी तो हो सकता है , मगर व्यक्तिगत अधिकार नहीं होता है . उसी तरह स्त्री के व्यक्तिगत अधिकारी बदल जाते है , और अधिकार क्रमशः लोप होते चले जाते है , यही सच है आज का .
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