कस्बों और महानगरों के सामान्य इलाकों में मकान किराया और प्लॉटों की कीमत कमोबेश एक सी हो गई है । पिछले बीस वर्षों में स्कूलों और कोचिंग क्लासों की फीस इतनी अधिक बढ़ गई है कि माँ-बाप अपनी ज़रूरतों को घटाकर ही पढ़ा पा रहे है अपने बच्चों को । बच्चों को गर्मियों की छुट्टियों में बाहर घुमाने ले जाना अब माँ बाप का भी सपना है और बच्चों का भी । दाल और पेट्रोल की बढ़ती हुई कीमतों पर जिरह और संघर्ष करता हुआ आदमी जब सरकार की तरफ आशा लगाता है तो क्या मिलता है ? सत्ता का संघर्ष और क्या । केजरीवाल , राहुल गाँधी, नरेंद्र मोदी की लड़ाई में आपकी तरफ देखने की फुरसत किसी को नहीं है भाई । एक बात यह भी है कि बदलाव का ठेका राजनेताओं को देकर हम उनके फैन बन गए हैं ।
लोकतंत्र की दीवार का कमजोर होना यही से शुरू होने लगता है कि 'लोक' सोचना समझना बन्द करके 'तंत्र' की शाबाशी और कमियाँ निकालने में मस्त हो जाए ।जिस भौगोलिक और साँस्कृतिक यूनिट को हम देश कहते है वह लोगो से बनता है , लोगों की प्रसन्नता से बनता है । नेताओं और सत्ता के भाषण से नहीं ।
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