स्कूल कॉलेज की कक्षाओं में एक नियम सा है, कि मास्टर जी जब बहुत सख्त हों और अनुशासन का डंडा चलायें तो कक्षा के बालकों में ग्रुप बनने शुरू हो जाते हैं। एक ग्रुप मानता है कि गुरूजी सही हैं, दूसरा मानता है कि बिलकुल ग़लत, तीसरा ग्रुप सोचता है कि गुरूजी को ख़ुद में ही थोड़ा सुधार करना चाहिए। आदि आदि । गुरूजी के अतिअनुशासन, या एक ही डंडे से सभी को हांकने के प्रयत्न का असर ये हुआ कि कक्षा में क्षेत्रीय विभाजन हो गया ।
भारत सरकार अगर यह सोचती है कि एक ही तरह से सभी को सोचना चाहिए या सभी लोगो को वैसे ही सोचना और करना है जैसे वो चाहती है, तो क्या होगा बताइये ! ग्रुप्स बनेंगे । बिहार में लालू प्रसाद यादव अचानक से राजनीतिक नायक कैसे बन उभरे है। उन्होंने उस असंतुष्ट ग्रुप का नेतृत्व किया जो सरकार की उस एकरूपता को अपनाना नहीं चाहता। विविधता भारत की पहचान है ! फिर आप इसे नकारेंगे तो क्षेत्रीयता मज़बूत होगी । लगातार मज़बूत होगी । सरकार इसी तरह अपना आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और टैक्स राष्ट्रवाद थोपती रही तो बंगाल में ममता बनर्जी भी जीतेंगी और उत्तर-प्रदेश में मायावती भी !
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