भारत में एक चेतना लोक चेतना का हिस्सा किस तरह बनती है । किस तरह भूगोल हमारे मानसिक भूगोल को प्रभावित करता है । खैबर दर्रे के नजदीक वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र में खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म हुआ । आश्चर्य की इस क्षेत्र को सदियों से बेहद अस्थिर माना जाता है और इस क्षेत्र के लोग भयंकर किस्म के लड़ाके रहे है , खुद खान का डील डौल मध्यकालीन कबायली युद्धा सा था मगर बादशाह खान ने बच्चा खान हो कर अहिंसा और सत्याग्रह को दिल से लगाया । आजीवन गाँधी के साथ पैदल चले और जब विभाजन के बाद उन्ही के शब्दों में उन्हें ' भेडियो के सामने फैंक दिया गया' तो भी पाक जाकर वे निरंतर सत्ता से लड़े । जीवन जेलों में बीता । मृत्यु के बाद अफगानिस्तान में दफनाया गया तो , जिस खैबर दर्रे से आक्रमणकारी आते थे उस दर्रे से शांति दूत के पक्ष में रैली की तरह लोग सम्वेदनायें प्रकट करने अफगान इलाके में गए । इस दौरान रूस ने सीज फायर घोषित किया और बच्चा खान बच्चों की तरह न किसी मुल्क की शास्ति रहे न सीमा में बंधे रहे । आगे देखिये , खुदा गवाह का अमिताभ , जंजीर का प्राण शेर खान हमारी चेतना की जंजीर की अहम् कड़िया है । ये चरित्र मुम्बई के डॉन हाजी मस्तान से प्रेरित है । और हाजी मस्तान की प्रेरणा खान अब्दुल गफ्फार खान थे । खां साहब ने ही खुदाई खिदमतगार के झंडे तले 'पख्तून जिर्गा ऐ हिन्द ' नामक संगठन की स्थापना करके हाजी मस्तान को लोगो के हक़ में बात उठाने को प्रेरित किया था । हाजी पहले पहल अफगानों का नेतृत्व करता रहा बाद में उसका मुम्बई दरबार ( सनी देवल के देवा की अदालत की तरह -जिद्दी फ़िल्म ) सभी के लिए खुल गया । हो सकता है यह गांधी के सर्वोदय से आंशिक प्रभावित हो ।
जब खैबर खुद खैबर न रहे , बादशाह खान बच्चा खान हो जाने लगे , गांधी का अनुयायी और साथी अंतिम समय तक जेल जाने से न घबराये , एक डॉन जनता दरबार लगाने लग जाए , और फिल्मो का शेर खान दोस्ती की कसम लगे । भारत की सामूहिक चेतना खैबर के दर्रे से निकल कर फिल्मो की श्रृंखला के बीच कही बह रही है । इसे गाँधी हवा देते है और खान साहब जी लेते है ।
Thursday, 26 May 2016
खुदाई खिदमतगार
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