Friday, 20 May 2016

सच कहते हो, हमें कौन जानता है

जिंदगी भर एक ही बनिया से सामान लिया । एक ही जगह से पंचर निकलवाया । बैंक के गार्ड को सलाम किया और बस कंडक्टर से अदब से टिकट माँगा । बच्चों के मास्टर खुद के गुरूजी लगे और मोहल्ले के बच्चों को खेलते हुए लताड़ा नहीं कभी । चार दोस्तों से लड़ते हुए , उनके लिए लड़ते हुए चौबीस साल गुज़ार दिए । पनवाड़ी से बीड़ी भी ली तो उससे आँख चुराते हुए ।

सच कहते हो, कौन जानता है हमे ।

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