कल रात समाचार आया कि सचिन पायलेट को राष्ट्रीय नेतृत्व ने तलब करके अपनी मुहिम बन्द करने का आदेश दिया है । सचिन और गुट पिछले कई दिनों से अशोक गहलोत के विरुद्ध खुली खेमेबाजी कर रहे थे और बकायदा अभियानरत भी थे ।
राजनीति की सूक्ष्मता इस बात से तय होती है कि आप कितने पानी के भीतर है और कितने पानी के ऊपर है । यह आइसबर्ग थ्योरी है । जिसका पालन आवश्यक रूप से किया ही जाना चाहिए । खुले तौर पर विरोध और समर्थन करने वाला पोलिटिकली इनकरेक्ट और राजनीतिक बचपना करता है । पायलेट ने भी यही किया । और भी बेजा गलतियाँ की । पहली तो यह कि वे अब तक अपनी टीम नहीं बना पाए है , उनके समूह में उनके पिता के तत्कालीन लोग है । दूसरे, सचिन अतिरिक्त रूप से अपनी कार्यकारिणी में सजातीय लोगो को बेजा जगह देते है और एक किचन कैबिनेट टाइप समूह से घिरे रहते है ।
संघर्ष और आंदोलन राजनीति का दूसरा बड़ा सच है । जो नेता आंदोलन में सक्षम और पारंगत है उसका जीवन उतना ही लम्बा है ,नेतृत्व के रूप में । इस दृष्टि से सचिन के सजातीय,समकालीन और सपार्टी विधायक धीरज अधिक पुष्ट और धीर है । वे निरंतर आन्दोलनरत रहते है और अपनी बात कहते समय अपनी जाति का नहीं अपने लोगो का प्रतिनिधित्व करते है । अंतर भी है - सचिन आनुवंशिक राजनीती से आते है और धीरज ग्रासरूट से । फिलहाल सचिन की अपरिपक्व राजनीति ने उन्हें यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया है की गहलोत उनके पिता तुल्य है । उम्र में भी और राजनीतिक कॉरिडोर में भी ।
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