कम से कम बाबा रामदेव के साथ बड़ा धोखा हुआ है । भारत स्वाभिमान के बैनर तले बाबा रामदेव ने निरंतर जन जागरण किया , अपने योग शिविरों को क्रूसेड जनसभाओं में बदला, कई टीवी कार्यक्रम किए , और रामलीला मैदान में भी अखिल भारतीय स्तर के आंदोलन की रूप रेखा बनाने का प्रयत्न किया । एक वह भी दौर था जब रामदेव लोकप्रियता के मामले में किसी भी बड़े नेता को टक्कर देते थे । बाबा ने कैसे साम्राज्य खड़ा किया , कैसे योग शिविरों को सभ्रांत लोगो के लिए सुरक्षित किया यह अलग बात है । मगर काले धन को लेकर जो जनचेतना बनी उसमे बाबा रामदेव का योगदान मौलिक है ।
उस वक्त भाजपा ने बाबा को उठते हुए चरम पर पहुँचने दिया और इससे पहले की रामदेव भारत स्वाभिमान पार्टी बनाते , बाबा को लपक लिया । बाबा ने भी अपने मुद्दों के लिए समर्थन देना ठीक समझा । मगर राजनीति के मैदान में बाबा को पहली बार शिकस्त तब मिली जब उन्होंने 100 सांसद सीट मांगी और मिली मुट्ठीभर । सीधी बात है , बाबा को मजबूत बना कर भाजपा खुद पार्टी के भीतर ही भाजपा-2 बनाने का रिस्क क्यों लेती ।
मगर आज बाबा क्या है । टीवी चैनल काले धन पर सवाल करते है तो बाबा का चेहरा सफेद पड़ जाता है । बाबा पतंजलि ब्रांड के ब्राण्ड एम्बेसेडर बने नही है , बनाये गए है । ताकि उन्हें ठोस व्यापारी की छवि में कैद करके क्रूसेडर की छवि से मुक्त किया जा सके । पब्लिक परसेप्शन को इसी तरह बदला जाता है, यह समूह का मनोविज्ञान है ।
अब जब रामदेव मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के साथ दिख रहे है तो यह बाबा का सहज चुनाव नही है । यह उस भग्न हृदय व्यक्ति की छटपटाहट है जो अब आंदोलनकारी रहा नहीं, व्यापारी बना दिया गया है , और खुद को वह संत सह राष्ट्रभक्त साबित करना चाहता है । यह उस मध्यकालीन राजनीतिक व्यक्ति सी हालत है , जिसे सत्ता प्राप्ति के बाद हज पर जाने का आदेश मिला है ।
Friday, 20 May 2016
बाबा रामदेव की गत
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politics
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