पद्म पुरस्कार लेते वक्त हलधर नाग नंगे पैर थे । बहुत सम्भव है कि इस तस्वीर को देखकर आप का जी कुछ देर के लिए वर्तमान काल खण्ड से उचट जाये । फिर आपका खुद के जीवन से भी मन उचट जाए और तत्पश्चात आपका अहम् अपनी तुष्टि के लिए हलधर नाग की शिष्टता में बाबा आम्टे या अपने दादा को देखने लगे । इस आशा में कि आप इस शख्स के व्यक्तित्व से रिलीज़ हो सकें ।
सच कुछ और है । कमर से टाइट जींस और सरकार की आलोचना ने हमें जकड़ लिया है । इस मुल्क की सच्चाई गॉवों की पगडंडियों से होते हुए वहाँ के सामाजिक तानेबाने में रची है । हलधर की कविताओं में औरत की आजादी का आह्वान उसके आंसुओं और समस्याओं में है । जिसे वो कस्बे कस्बे जा कर गाते है । इनकी कविताओं में जातिभेद का दुःख आरक्षण को निशाने पर लेकर चुप नहीं होता । वह दुःख रोजमर्रा का संघर्ष है जो निरन्तर घटित होता है , जिसे हलधर सिर्फ बयान करते है । सामाजिक वितन्डो को वे यथास्थिति में कहते है - जिसे अपना लगे वो हँस दे या रो दे । इसीलिए वे जनकवि है उड़ीसा की कोसली भाषा के । लोगो की बात लोगो की जबान में कह देने से लोगो को लड़ने का हौंसला मिलता है । एक जनांदोलन की तैयारी इसी तरह होती है ।
हलधर का पहनावा कहता है की वे बेहद सामान्य श्रेणी से उठकर आये है । लेकिन पेट दिखाकर आपकी सम्वेदना नहीं जगाऊंगा । बस यह कि, वे तीसरी कक्षा तक पढ़े है मगर अपनी जन आवाज से कई स्कॉलरों को अपनी कविताओं पर रिसर्च करने के लिए आकर्षित करते है ।
हमारी परम्परा राष्ट्रपति भवन पर नंगे पैर पहुंची है । सामाजिक मुद्दों की बाते देसी आवाज में लोगो तक गई है । हमे देखना होगा की जिस तरह का जीवन हम जी रहे है वह बहुत हद तक सच नहीं है । कन्धे पर हल धर कर आज जो लोग सुदूर कोनों में रहते है । हलधर उनका ही जीवन कहते है ।
No comments:
Post a Comment