राजस्थान लोक सेवा आयोग के साक्षात्कारों में करीब पाँच साल तक एक प्रश्न अधिकतर उम्मीदवारों से पूछा गया , ' महाराणा प्रताप महान है या अकबर महान है ? '
सवाल एक मगर जवाब बहुत से , जो भी जवाब था । उसे सही साबित करने का दबाव हर प्रतियोगी पर था । इस प्रश्न को एक कोचिंग संस्थान के संचालक जो की स्वयं राज्य सरकार में अधिकारी भी है (पत्नी के नाम से संस्था चलाते है ) ने काफी हद तक सुलझा लिया । कहते थे - महान कोई भी हो , आयोग राणा प्रताप ही सुनना चाहता है ।
पड़ताल की तो मालूम चला संघ कोटे के सदस्य है , यह सवाल वे ही पूछते थे हर साल हर बार ।
मेरा साक्षात्कार होता तो मैंने भी अपना जवाब बना रखा था ।
मूल सवाल मगर यह है की अकबर रोड़ का नाम महाराणा प्रताप रोड़ करने के पीछे क्या मानसिकता काम कर रही है । वही , संघ की हीन ग्रन्थि । जो मानती है की हिन्दू धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है , हिन्दू ही विजेता है , और हिन्दू ही बेहतर लड़ाका है । मैं पूछना तो यह भी चाहूँगा की जिस स्वाभिमानी व्यक्ति को अकबर और उसका साम्राज्यवादी तंत्र कभी दिल्ली के दरबार में न ले जा सका , उस व्यक्ति को सड़क के नाम पर दिल्ली क्यों ले जाना चाहते हो । साम्प्रदायिक वोट बैंक की अवचेतन प्रभाव रणनीति । और क्या ।
महानता का जवाब दिया जाए , तो क्या जवाब हो सकता है । राणा प्रताप आम आदमी के नायक है । और अकबर शासन के नायक । दोनों नितांत ही अलग , गैर बराबर और जरुरी नायकत्व है । राणा अस्मिता और स्वाभिमान के लिए जंगलों में धक्के खाते है , तो अकबर इस राष्ट्र के एकीकरण के लिए हिन्दू राजाओं के साथ एक थाली में रोटी खाते है ।
आधुनिक साम्प्रदायिक राजनीति हमसें दोनों ही महानताओं को खींच ले जाना चाहती है । कभी इंटरव्यू बोर्ड में अपनी हारी हुई मानसिकता का सवाल पूछकर तो कभी सड़क का नाम बदल कर ।
'नाश हो '
Thursday, 26 May 2016
अकबर रोड़ या राणा प्रताप रोड़
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politics
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