उरी हमलें के बाद हर तीसरा व्यक्ति या तो हताश है, या हमले और आक्रमण की पैरवी कर रहा हैं। युद्ध की वकालत हो रही है। जानकार कह रहे है की 'जन भावनाओं' को देख कर युद्ध नही लड़े जाते। बात तो ठीक है, मगर ये जनभावना युद्ध की पैरवी ही क्यों कर रही है? अन्य विकल्प क्यों नही सुझा रही! जनता मूल रूप से हिंसक ही होती है, या फिर भारत-पाक नामक फिनोमेना युद्ध के आग्रह का पर्यायवाची है।
बहुत से ऐतिहासिक कारण हैं, जो जनता को युद्ध की वकालत को बाध्य करते है।
मगर फिर भी प्रश्न उठता है, कि हमारा इतिहास बोध इतना जुझारू है वाकई! इतना कि लगभग हर तीसरा व्यक्ति युद्ध की अनिवार्यता को ठान कर बैठ ही जाए ! इतना हिंसक समाज तो नही है हमारा।
कही ऐसा तो नही है कि सरकारों की विफलता को जनता भोग रही है! विभाजन, तीन प्रत्यक्ष युद्ध और निरन्तर चल रहे छद्म युद्ध जनता की सफलता असफलता से इतर पाक नामक मुद्दे को लेकर सरकार की शालीन असफलता का चिह्न बन गया हैं। सरकारों की सफलता उनकी निजी सफलता बन जाती है, मगर उनकी असफलता जनता के लिए अदृश्य बोझ है। और जनता इस बोझ को युद्ध के जरिए उतारना चाहती हैं।
अठ्ठारह जवानों के शहीद होने के बाद जिस युद्ध की कल्पना की जा रही हैं, उसमे और सैनिक शहीद नहीं होंगे ? नागरिक हताहत नही होंगे ? यह विवेक लोग खूब समझते हैं। मगर आप अपने कृत्य पर आप शर्मिंदा नही है, तो बिना गलती किए भी मुझे शर्मिंदा होना पड़ेगा।
सरकारों ने इस फिनोमेन को शर्मिंदगी की हद तक असफल कर दिया है सात दशकों में, चूँकि वो शर्मिंदा नही होती हैं। सो नागरिक शर्मिंदा होकर युद्ध का आग्रह कर रहा हैं।
वह भी जानता हैं की युद्ध किसी समस्या का समाधान नही हैं। मगर यह समस्या है ही नही अब नागरिक के लिए। यह तो शर्मिंदगी से बचने के लिए किया जा रहा आत्मदाह जैसा उन्माद है।
Wednesday, 21 September 2016
भारत-पाक युद्ध उन्माद
Sunday, 18 September 2016
पारिकर-केजरीवाल
मनोहर पारिकर ने कहा है, केजरीवाल की जबान मोदी जी के खिलाफ बोलने के कारण कटी हैं।
कुछ फुटकर अनुमान-
* पारिकर का यह बयान उनकी मौलिक खोज नही हैं, बल्कि सोशल मीडिया के इनपुट्स पर भारत सरकार की अतिशय निर्भरता हैं।
देखिए यह सरकार जमीन से कितनी जुड़ी हुई हैं।
* देश में रक्षामंत्री को गहरा और तीक्ष्ण बुद्धि होना ही चाहिये। पता लगता है की वर्तमान रक्षामंत्री की बुद्धि गहनता कितनी छिछली है।
* गोवा में आम आदमी पार्टी की बढ़ती हुई लोकप्रियता और जनाधार से पारिकर बौखला गए हैं। दो बाते हैं;
एक तो यह की रक्षा मंत्री के तौर पर वे गुड्डे की तरह बैठे है। निर्णय नही कर पा रहे है, सो गोवा भागना चाहते है।
दूसरी बात यह कि, गोवा और दिल्ली दोनों के राजनीतिक भविष्य के प्रति शंकित पारिकर केजरीवाल पर हमला बोलकर अपनी क्षत्रपी बचा लेना चाहते है।
'टूटटी फिसलती जबाने'
Thursday, 26 May 2016
अकबर रोड़ या राणा प्रताप रोड़
राजस्थान लोक सेवा आयोग के साक्षात्कारों में करीब पाँच साल तक एक प्रश्न अधिकतर उम्मीदवारों से पूछा गया , ' महाराणा प्रताप महान है या अकबर महान है ? '
सवाल एक मगर जवाब बहुत से , जो भी जवाब था । उसे सही साबित करने का दबाव हर प्रतियोगी पर था । इस प्रश्न को एक कोचिंग संस्थान के संचालक जो की स्वयं राज्य सरकार में अधिकारी भी है (पत्नी के नाम से संस्था चलाते है ) ने काफी हद तक सुलझा लिया । कहते थे - महान कोई भी हो , आयोग राणा प्रताप ही सुनना चाहता है ।
पड़ताल की तो मालूम चला संघ कोटे के सदस्य है , यह सवाल वे ही पूछते थे हर साल हर बार ।
मेरा साक्षात्कार होता तो मैंने भी अपना जवाब बना रखा था ।
मूल सवाल मगर यह है की अकबर रोड़ का नाम महाराणा प्रताप रोड़ करने के पीछे क्या मानसिकता काम कर रही है । वही , संघ की हीन ग्रन्थि । जो मानती है की हिन्दू धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है , हिन्दू ही विजेता है , और हिन्दू ही बेहतर लड़ाका है । मैं पूछना तो यह भी चाहूँगा की जिस स्वाभिमानी व्यक्ति को अकबर और उसका साम्राज्यवादी तंत्र कभी दिल्ली के दरबार में न ले जा सका , उस व्यक्ति को सड़क के नाम पर दिल्ली क्यों ले जाना चाहते हो । साम्प्रदायिक वोट बैंक की अवचेतन प्रभाव रणनीति । और क्या ।
महानता का जवाब दिया जाए , तो क्या जवाब हो सकता है । राणा प्रताप आम आदमी के नायक है । और अकबर शासन के नायक । दोनों नितांत ही अलग , गैर बराबर और जरुरी नायकत्व है । राणा अस्मिता और स्वाभिमान के लिए जंगलों में धक्के खाते है , तो अकबर इस राष्ट्र के एकीकरण के लिए हिन्दू राजाओं के साथ एक थाली में रोटी खाते है ।
आधुनिक साम्प्रदायिक राजनीति हमसें दोनों ही महानताओं को खींच ले जाना चाहती है । कभी इंटरव्यू बोर्ड में अपनी हारी हुई मानसिकता का सवाल पूछकर तो कभी सड़क का नाम बदल कर ।
'नाश हो '
सनातन हिन्दू धर्म और हिंदुत्व
सनातनी हिन्दू धर्म का राजनीतिक संस्करण; हिंदुत्व असल में प्रतिक्रियावादी हिंसक संस्करण है। जिसका अंतिम लक्ष्य लोगों को मुर्ख बना कर कट्टरपंथी बनाना है । हिन्दू धर्म की जड़े यही हिंदुत्व खोद रहा है । गले में केसरिया मफलर डाल कर हिन्दू धर्म की रक्षा करने निकले लोग भूल जाते है की असल में वे एक कट्टरपंथी राजनीतिक दर्शन की रक्षार्थ जुटे है ।
हिन्दू होने के लिए सिंधु का पानी पीना पड़ता है, खून नहीं ।
खुदाई खिदमतगार
भारत में एक चेतना लोक चेतना का हिस्सा किस तरह बनती है । किस तरह भूगोल हमारे मानसिक भूगोल को प्रभावित करता है । खैबर दर्रे के नजदीक वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र में खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म हुआ । आश्चर्य की इस क्षेत्र को सदियों से बेहद अस्थिर माना जाता है और इस क्षेत्र के लोग भयंकर किस्म के लड़ाके रहे है , खुद खान का डील डौल मध्यकालीन कबायली युद्धा सा था मगर बादशाह खान ने बच्चा खान हो कर अहिंसा और सत्याग्रह को दिल से लगाया । आजीवन गाँधी के साथ पैदल चले और जब विभाजन के बाद उन्ही के शब्दों में उन्हें ' भेडियो के सामने फैंक दिया गया' तो भी पाक जाकर वे निरंतर सत्ता से लड़े । जीवन जेलों में बीता । मृत्यु के बाद अफगानिस्तान में दफनाया गया तो , जिस खैबर दर्रे से आक्रमणकारी आते थे उस दर्रे से शांति दूत के पक्ष में रैली की तरह लोग सम्वेदनायें प्रकट करने अफगान इलाके में गए । इस दौरान रूस ने सीज फायर घोषित किया और बच्चा खान बच्चों की तरह न किसी मुल्क की शास्ति रहे न सीमा में बंधे रहे । आगे देखिये , खुदा गवाह का अमिताभ , जंजीर का प्राण शेर खान हमारी चेतना की जंजीर की अहम् कड़िया है । ये चरित्र मुम्बई के डॉन हाजी मस्तान से प्रेरित है । और हाजी मस्तान की प्रेरणा खान अब्दुल गफ्फार खान थे । खां साहब ने ही खुदाई खिदमतगार के झंडे तले 'पख्तून जिर्गा ऐ हिन्द ' नामक संगठन की स्थापना करके हाजी मस्तान को लोगो के हक़ में बात उठाने को प्रेरित किया था । हाजी पहले पहल अफगानों का नेतृत्व करता रहा बाद में उसका मुम्बई दरबार ( सनी देवल के देवा की अदालत की तरह -जिद्दी फ़िल्म ) सभी के लिए खुल गया । हो सकता है यह गांधी के सर्वोदय से आंशिक प्रभावित हो ।
जब खैबर खुद खैबर न रहे , बादशाह खान बच्चा खान हो जाने लगे , गांधी का अनुयायी और साथी अंतिम समय तक जेल जाने से न घबराये , एक डॉन जनता दरबार लगाने लग जाए , और फिल्मो का शेर खान दोस्ती की कसम लगे । भारत की सामूहिक चेतना खैबर के दर्रे से निकल कर फिल्मो की श्रृंखला के बीच कही बह रही है । इसे गाँधी हवा देते है और खान साहब जी लेते है ।
Friday, 20 May 2016
ममता , माया और राष्ट्रवाद
स्कूल कॉलेज की कक्षाओं में एक नियम सा है, कि मास्टर जी जब बहुत सख्त हों और अनुशासन का डंडा चलायें तो कक्षा के बालकों में ग्रुप बनने शुरू हो जाते हैं। एक ग्रुप मानता है कि गुरूजी सही हैं, दूसरा मानता है कि बिलकुल ग़लत, तीसरा ग्रुप सोचता है कि गुरूजी को ख़ुद में ही थोड़ा सुधार करना चाहिए। आदि आदि । गुरूजी के अतिअनुशासन, या एक ही डंडे से सभी को हांकने के प्रयत्न का असर ये हुआ कि कक्षा में क्षेत्रीय विभाजन हो गया ।
भारत सरकार अगर यह सोचती है कि एक ही तरह से सभी को सोचना चाहिए या सभी लोगो को वैसे ही सोचना और करना है जैसे वो चाहती है, तो क्या होगा बताइये ! ग्रुप्स बनेंगे । बिहार में लालू प्रसाद यादव अचानक से राजनीतिक नायक कैसे बन उभरे है। उन्होंने उस असंतुष्ट ग्रुप का नेतृत्व किया जो सरकार की उस एकरूपता को अपनाना नहीं चाहता। विविधता भारत की पहचान है ! फिर आप इसे नकारेंगे तो क्षेत्रीयता मज़बूत होगी । लगातार मज़बूत होगी । सरकार इसी तरह अपना आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और टैक्स राष्ट्रवाद थोपती रही तो बंगाल में ममता बनर्जी भी जीतेंगी और उत्तर-प्रदेश में मायावती भी !
रोहित वेमुला के पीछे
मैं इन्फेक्टेड महसूस कर रहा हूँ। बारूद के मौसम से इन्फेक्टेड। हुआ यह है की रोहित वेमुला की आत्महत्या अगर ' इंस्टिट्यूशनलाइज्ड मर्डर ' है तो महाराष्ट्र के 5000 किसानों की एक साल के भीतर हुई आत्महत्याएँ संस्थानिक हत्या क्यों नहीं है । कन्हैया एक प्रोपगेंडा का शिकार अभियुक्त है तो रोज रोज क्राइम और करप्शन से लोहा लेता आम भारतीय किस शब्दावली का शिकार है। राजनीति का सबसे बुरा दौर हर वक़्त रहता है। मगर आज का दौर इसलिए भी नाज़ुक बन पड़ा है क्योंकि राष्ट्रीय विमर्श के विषय और हमारी सामूहिक चिंता की सलवटे राष्ट्रीय मनोरंजन से जा मिले है। सड़क से संसद तक असली सवालों की बजाए कम असली सवालों पर भिड़ रहे है हम । बदलते हुए मौसम में जब लोग सर्दी से सिकुड़े जा रहे है और राजनीतिक उबाल से गर्म होते जा रहे है, किसान आत्महत्या, नक्सली कारवाहियो, बेकारी, क्राइम - करप्शन के मूलभूत मुद्दे पटल से गायब है। दोष किसे देँ, पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों उलझे है। और हम किसी एक खेमे में इन्फेक्टेड होकर पड़े हुए राष्ट्रीय मनोरंजन का मजा लूट रहे है ।
लोकतन्त्र में लोभतन्त्र
कस्बों और महानगरों के सामान्य इलाकों में मकान किराया और प्लॉटों की कीमत कमोबेश एक सी हो गई है । पिछले बीस वर्षों में स्कूलों और कोचिंग क्लासों की फीस इतनी अधिक बढ़ गई है कि माँ-बाप अपनी ज़रूरतों को घटाकर ही पढ़ा पा रहे है अपने बच्चों को । बच्चों को गर्मियों की छुट्टियों में बाहर घुमाने ले जाना अब माँ बाप का भी सपना है और बच्चों का भी । दाल और पेट्रोल की बढ़ती हुई कीमतों पर जिरह और संघर्ष करता हुआ आदमी जब सरकार की तरफ आशा लगाता है तो क्या मिलता है ? सत्ता का संघर्ष और क्या । केजरीवाल , राहुल गाँधी, नरेंद्र मोदी की लड़ाई में आपकी तरफ देखने की फुरसत किसी को नहीं है भाई । एक बात यह भी है कि बदलाव का ठेका राजनेताओं को देकर हम उनके फैन बन गए हैं ।
लोकतंत्र की दीवार का कमजोर होना यही से शुरू होने लगता है कि 'लोक' सोचना समझना बन्द करके 'तंत्र' की शाबाशी और कमियाँ निकालने में मस्त हो जाए ।जिस भौगोलिक और साँस्कृतिक यूनिट को हम देश कहते है वह लोगो से बनता है , लोगों की प्रसन्नता से बनता है । नेताओं और सत्ता के भाषण से नहीं ।
पायलेट का जहाज और गहलोत की गाड़ी
कल रात समाचार आया कि सचिन पायलेट को राष्ट्रीय नेतृत्व ने तलब करके अपनी मुहिम बन्द करने का आदेश दिया है । सचिन और गुट पिछले कई दिनों से अशोक गहलोत के विरुद्ध खुली खेमेबाजी कर रहे थे और बकायदा अभियानरत भी थे ।
राजनीति की सूक्ष्मता इस बात से तय होती है कि आप कितने पानी के भीतर है और कितने पानी के ऊपर है । यह आइसबर्ग थ्योरी है । जिसका पालन आवश्यक रूप से किया ही जाना चाहिए । खुले तौर पर विरोध और समर्थन करने वाला पोलिटिकली इनकरेक्ट और राजनीतिक बचपना करता है । पायलेट ने भी यही किया । और भी बेजा गलतियाँ की । पहली तो यह कि वे अब तक अपनी टीम नहीं बना पाए है , उनके समूह में उनके पिता के तत्कालीन लोग है । दूसरे, सचिन अतिरिक्त रूप से अपनी कार्यकारिणी में सजातीय लोगो को बेजा जगह देते है और एक किचन कैबिनेट टाइप समूह से घिरे रहते है ।
संघर्ष और आंदोलन राजनीति का दूसरा बड़ा सच है । जो नेता आंदोलन में सक्षम और पारंगत है उसका जीवन उतना ही लम्बा है ,नेतृत्व के रूप में । इस दृष्टि से सचिन के सजातीय,समकालीन और सपार्टी विधायक धीरज अधिक पुष्ट और धीर है । वे निरंतर आन्दोलनरत रहते है और अपनी बात कहते समय अपनी जाति का नहीं अपने लोगो का प्रतिनिधित्व करते है । अंतर भी है - सचिन आनुवंशिक राजनीती से आते है और धीरज ग्रासरूट से । फिलहाल सचिन की अपरिपक्व राजनीति ने उन्हें यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया है की गहलोत उनके पिता तुल्य है । उम्र में भी और राजनीतिक कॉरिडोर में भी ।
लातूर का नमकीन पानी
बंगाल में कम्पनी सरकार का राज हुआ, बीस साल भी न बीते थे बक्सर की लड़ाई को और दुर्भिक्ष पड़ा, खुद अंग्रेज अफसरों ने ब्रिटेन पत्र लिखे कि इस मुल्क को हमनें इस हद तक बर्बाद कर दिया है कि बंगाल के अकाल में कुछ जगह पर लोगों ने मानव माँस खा कर जीवन बचाया है|
राज बदला , तो लगा खुद कि लोग खुद के लोगो से सम्वेदना रखेंगे , साथ गम बाटेंगे । स्वराज आएगा । स्वराज आने के लिए रवाना तो हुआ , मगर बीच रास्ते में ही रुक गया । लातूर तक नही पहुँच पाया । लातूर की ही बात नहीं है , राजस्थान में तो हर दूसरे बरस अकाल पड़ता है । कितनी हास्यास्पद बात है , नेशनल ग्रिड बन रहा है , ताकि बिजली का न्यायपूर्ण बँटवारा हो सके । बिजली न आएगी तो पसीना निकलेगा । मगर पानी नहीं होगा तो अर्थी उठेगी, जनाजा निकेलगा । विकास की किताब में बिजली के पन्ने के बाद पानी का पन्ना क्यों नहीं है । शहर के चेप्टर के बाद गाँव का चेप्टर क्यों नहीं है ।
कभी नहीं रखा गया , आज भी कोई नहीं रख रहा ।सत्ता सेल्फ और सेल्फ़ी में मग्न है |
प्रशासन उनके ट्विटर हैंडल हैंडल कर रहा है । कुछ आँखों का पानी सूख गया है , कुछ का रुकने का नाम नहीं ले रहा है ।
मीठा और आँखों का नमकीन पानी दोनों एक दूसरें छोर पर खड़े होकर एक दूसरें का इंतजार कर रहे है ।
बाबा रामदेव की गत
कम से कम बाबा रामदेव के साथ बड़ा धोखा हुआ है । भारत स्वाभिमान के बैनर तले बाबा रामदेव ने निरंतर जन जागरण किया , अपने योग शिविरों को क्रूसेड जनसभाओं में बदला, कई टीवी कार्यक्रम किए , और रामलीला मैदान में भी अखिल भारतीय स्तर के आंदोलन की रूप रेखा बनाने का प्रयत्न किया । एक वह भी दौर था जब रामदेव लोकप्रियता के मामले में किसी भी बड़े नेता को टक्कर देते थे । बाबा ने कैसे साम्राज्य खड़ा किया , कैसे योग शिविरों को सभ्रांत लोगो के लिए सुरक्षित किया यह अलग बात है । मगर काले धन को लेकर जो जनचेतना बनी उसमे बाबा रामदेव का योगदान मौलिक है ।
उस वक्त भाजपा ने बाबा को उठते हुए चरम पर पहुँचने दिया और इससे पहले की रामदेव भारत स्वाभिमान पार्टी बनाते , बाबा को लपक लिया । बाबा ने भी अपने मुद्दों के लिए समर्थन देना ठीक समझा । मगर राजनीति के मैदान में बाबा को पहली बार शिकस्त तब मिली जब उन्होंने 100 सांसद सीट मांगी और मिली मुट्ठीभर । सीधी बात है , बाबा को मजबूत बना कर भाजपा खुद पार्टी के भीतर ही भाजपा-2 बनाने का रिस्क क्यों लेती ।
मगर आज बाबा क्या है । टीवी चैनल काले धन पर सवाल करते है तो बाबा का चेहरा सफेद पड़ जाता है । बाबा पतंजलि ब्रांड के ब्राण्ड एम्बेसेडर बने नही है , बनाये गए है । ताकि उन्हें ठोस व्यापारी की छवि में कैद करके क्रूसेडर की छवि से मुक्त किया जा सके । पब्लिक परसेप्शन को इसी तरह बदला जाता है, यह समूह का मनोविज्ञान है ।
अब जब रामदेव मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के साथ दिख रहे है तो यह बाबा का सहज चुनाव नही है । यह उस भग्न हृदय व्यक्ति की छटपटाहट है जो अब आंदोलनकारी रहा नहीं, व्यापारी बना दिया गया है , और खुद को वह संत सह राष्ट्रभक्त साबित करना चाहता है । यह उस मध्यकालीन राजनीतिक व्यक्ति सी हालत है , जिसे सत्ता प्राप्ति के बाद हज पर जाने का आदेश मिला है ।
क्षेत्रीय पार्टियों का उठान
केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण भारतीय राजनीति के स्थाई तत्व है । सत्ता, शासन और राज्य इन तत्वों के बीच झूलता रहा है । गुप्त साम्राज्य के अतिशय दानपत्रों ने सामन्तवाद को बढ़ावा दिया और देश करीब सात सौ वर्षों तक स्थानीय क्षत्रपों के हाथ में चला गया । पिछले चुनाव में केंद्रीकरण की कोशिश हुई , मगर जैसे ही केंद्र ने अति केंद्रीकरण की कोशिश की , स्थानीय शक्तियाँ फिर से उठने लगी है । दिल्ली और बिहार के बाद अन्य राज्यों में क्षत्रप फिर से उठे है तो सन्देश साफ है , की बहुलतावाद की सांस्कृतिक विशेषता भारतीय राजनीति का भी अनिवार्य तत्व है ।
हम विशेष तरह की राष्ट्रीयता में रहते हैं । जहाँ एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति जैसी संज्ञाओं का कोई काम नहीं है । अनेकता हमारी सामूहिक चेतना का एकल राष्ट्रवाद है ।
' राजनीतिक संस्कृति'
भूमि अधिग्रहण का बहुरूपिया
एक पाँव में घुँगरू पहने बहुरुपिये के एक हाथ में लकड़ी होती है । जिसपर पायजेब की तरह के घुँघरू बंधे होते है । उसका चेहरा पुता हुआ और आँखे हल्की सी काजल से ढँकी होती है । घुटनों तक के वस्र और बाल लम्बे से ।
ऐसा क्या हुलिया है , की गाँव के बच्चे डर और कौतुहल में इसके पीछे चल देते है । बहुरूपिया भी आँखों की कोरों से बच्चों की भीड़ की चौड़ाई नापता हुआ आगे बढ़ता है धीरे धीरे , गाँव के बुजुर्ग बच्चों को डाँटते हुए आगे बढ़ते है की नाहक ही भीड़ लगाईं हुई है । बहुरूपिया गाँव से बिना खाना -पैसा माँगे गाँव पार कर जाता है । गाँव के बाहर के कुएँ पर बैठकर वह बीड़ी सुलगाता है । अपने सामान ठीक करता है और चुपचाप ,धीरे धीरे बच्चों की संख्या भी गिन रहा होता है । बच्चें थोड़ा डरे से ,थोड़ी शंका में , थोड़े जिज्ञासु से उसके आस-पास खड़े होते है घेरा बना कर । फिर बहुरूपया उन्हें भगा देता है ।
बच्चे गाँव पार करते हुए घरों लौट आते है । सारा हाल घर वालो को कह सुनाते है ।
घर वाले उन यादों में डूब जाते है कुछ क्षणों के लिए , जब वे भी ऐसा ही करते थे । और बताते है की वो फिर आएगा और रोटी-पैसा मांग कर ले जाएगा गाँव में से , उसका बच्चों को घर और गांव से बाहर ले जाना ही उसका खेल और कला है ।
पूंजीवाद ने गाँवों में ऐसे ही प्रवेश किया था कभी । उसके एक पाँव में आधुनिकता का घुँगरू था ,और हाथ में आजादी की लकड़ी जिसपर प्रेम का घुँगरू पायजेब की तरह लटका था । कारखाने में काम करने की वजह से पेंट घुटनो तक चढ़ी थी , और आँखों में फैक्ट्री के काले धुँए का काजल था । उसके अर्ध-पूर्ण, अर्ध-स्वतंत्र और आधे बंधे हुए अस्तित्व के पीछे नए लोग बौरा गए । गाँव के बाहर सुस्ताते हुए उसने सामान खोल कर बीड़ी जलाई और बताने की चेष्टा की कि वह भी जीवन को धुएं में उड़ाना चाहता है । मगर उड़ा नहीं पाया , उड़ा नहीं पा रहा । वह शहर आ कर लोगों को बसनें से पहले चेता कर घर वापस भगा देना चाहता है , मगर लोग नहीं मानते ।
जिस दिन शहरों से निकलकर , लोग बच्चा होकर फिर से घर लौटेंगे । पूंजीवाद की कथा कहेंगे । घरवाले बहुरुपिये को याद करेंगे कुछ क्षणों के लिए ।
अब वह गाँव में लौटेगा , रोटी - पैसा मांगने के लिए । भूमिअधिग्रहण का रूप धर कर ।