लोग तुमसे प्रेम करते रहे ताजिंदगी, मगर तुम किसी से प्रेम नहीं कर सकें। यही तुम्हारें जीवन की बड़ी विडम्बनाओं में से एक है। क्यों तुम कभी खुल न सके, क्यों तुम हमेशा प्रेमी होने का बोझ ढोते रहे।
कई किताबे हुई जो शब्द झड़का कर खाली हो जाना चाहती थी, मगर तुम पेन्सिल बने रहे, सिलते रहे अपने शब्दों के अर्थ। उछाल कर शब्दों को गिनते रहे धरती पर गिरने वाली मात्राओं को।ओ मनुज! हाथ पकड़ना सीखो उन बच्चों का जो तुम्हारें लिए अपनी कञ्चियां मुट्ठी में दबाए देर शाम तक तुम्हारा इंतजार करते हैं।
आँखे पहचानों उन चौराहे के दुकानदारों की जो पसीना पोंछते हुए तुम्हे देख कर मुस्कुराते हैं। बढ़ी हुई कलमों वाले आवारा दोस्तों की पदचाप पहचानों वो तुम्हारें मोहल्ले तक आ कर मुड़ जाते है वापस।
अपने प्रेमद्रोही होने का बोझ इतवार को उतार दो।
'इत इत इतवार'
Sunday, 18 September 2016
इत इत इतवार
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