मैं इन्फेक्टेड महसूस कर रहा हूँ। बारूद के मौसम से इन्फेक्टेड। हुआ यह है की रोहित वेमुला की आत्महत्या अगर ' इंस्टिट्यूशनलाइज्ड मर्डर ' है तो महाराष्ट्र के 5000 किसानों की एक साल के भीतर हुई आत्महत्याएँ संस्थानिक हत्या क्यों नहीं है । कन्हैया एक प्रोपगेंडा का शिकार अभियुक्त है तो रोज रोज क्राइम और करप्शन से लोहा लेता आम भारतीय किस शब्दावली का शिकार है। राजनीति का सबसे बुरा दौर हर वक़्त रहता है। मगर आज का दौर इसलिए भी नाज़ुक बन पड़ा है क्योंकि राष्ट्रीय विमर्श के विषय और हमारी सामूहिक चिंता की सलवटे राष्ट्रीय मनोरंजन से जा मिले है। सड़क से संसद तक असली सवालों की बजाए कम असली सवालों पर भिड़ रहे है हम । बदलते हुए मौसम में जब लोग सर्दी से सिकुड़े जा रहे है और राजनीतिक उबाल से गर्म होते जा रहे है, किसान आत्महत्या, नक्सली कारवाहियो, बेकारी, क्राइम - करप्शन के मूलभूत मुद्दे पटल से गायब है। दोष किसे देँ, पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों उलझे है। और हम किसी एक खेमे में इन्फेक्टेड होकर पड़े हुए राष्ट्रीय मनोरंजन का मजा लूट रहे है ।
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