दूर देश में एक कालबेलिया अपनी काली भेड़े चरा कर देर शाम को लौटता है , घर आकर वह पूरे दिन की थकान कागज पर उड़ेल देता है । उसकी पत्नी उसे कहती है - आँसु की अंतिम यात्रा लिखों । उसका छोटा बेटा कहता है - न्याय की दीवार दिखाओं शब्दों में । उसका पिता खाँसते हुए कहता है - आजादी का मर्म स्थल कहो ।
अचानक वह खांट से उठता है ,बुझा कोयला उठाता है चूल्हे से और सफेद भेड़ चुनकर उसकी पीठ पर लिख देता है ;
' अज्ञात से उठा आंसू न्याय की दीवार पर लुढ़कता हुआ प्यास के होठ पर स्वतंत्रता का स्वाद बन रहा है । क्रांति ऐसे ही घटित होती है .हे !पिता ! हे पुत्र ! हे प्रिया ! '
Thursday, 26 May 2016
क्रांति का बीज
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