Friday, 20 May 2016

जब किसान मरता है

किसान आत्महत्या करता है तो एक पूरा तंत्र मरता है । किसान की पत्नी कर्ज चुकाने के लिए या तो पशुओं को बेच कर या जमीन बेच कर उधार चुकाने का इंतजाम करती है । क्योंकि किसान के मरने से कर्जा माफ नहीं होता , उल्टे रकम चुकाने का दबाव ज्यादा बढ़ जाता है । किसान को रोने आने वाले लोग , रिश्तेदार और महाजन तीये की बैठक के बाद से ही अपने पैसे के डूब जाने के डर से अपने अपने तरीके से दबाव बना जाते है ।

किसान का पुत्र उम्र में कम हो या बालिग हो , उसका भविष्य नए रूप में निर्धारित होता है । पढाई करना अब उसके बस में नहीं होता । अब उसे घर का सामाजिक और आर्थिक नेतृत्व करना होता है । अपने बाप के हिस्से का दर्द अब उसे झेलना है , निरंतर ।

किसान की बेटी को लोगो को यह विश्वास दिलवाना है अब की उसके पिता दिवालिया होने के डर से नहीं मरे है । उसका भाई बैंक, महाजन और रिश्तेदारों का एक एक रूपया लौटाएगा ।

किसान के बैल, गाय , भैंस , बकरियाँ या तो बिकने के लिए इन्तज़ार करते है या कटने के लिए । आर्थिक तंगी से जूझता हुआ परिवार मृत्यु उपरान्त किए जाने वाले सामाजिक क्रियाकर्मो के लिए इन्हें ही बेच कर पूँजी जुटाएगा ।

घर का बड़ा सदस्य अब नहीं है , घरेलू जायदाद के मसले , खेत के सीमांकन की ग्रामीण समस्या, खेत मे पानी लाने के मौखिक समझौते सब अबसे नए सिरे से परिभाषित होने है । यह बोझ या तो किसान की पत्नी को ढोना है या बड़े लड़के को ।

सच यह है की आत्महत्या के वक्त किसान जब  फंदा फांद रहा होता है , समानांतर रूप से एक अदृश्य फंदा उसके बच्चों , परिवार और पशुओं के लिए भी कसा जा रहा होता है ।

किसान अपनी मृत्यु  चुन लेता है , सिस्टम उसके परिवार को जिन्दा मारता है फिर रोज , बरसों तक । मृत्यु भी उन्हें चुनने से मना कर देती है ।

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