एक पाँव में घुँगरू पहने बहुरुपिये के एक हाथ में लकड़ी होती है । जिसपर पायजेब की तरह के घुँघरू बंधे होते है । उसका चेहरा पुता हुआ और आँखे हल्की सी काजल से ढँकी होती है । घुटनों तक के वस्र और बाल लम्बे से ।
ऐसा क्या हुलिया है , की गाँव के बच्चे डर और कौतुहल में इसके पीछे चल देते है । बहुरूपिया भी आँखों की कोरों से बच्चों की भीड़ की चौड़ाई नापता हुआ आगे बढ़ता है धीरे धीरे , गाँव के बुजुर्ग बच्चों को डाँटते हुए आगे बढ़ते है की नाहक ही भीड़ लगाईं हुई है । बहुरूपिया गाँव से बिना खाना -पैसा माँगे गाँव पार कर जाता है । गाँव के बाहर के कुएँ पर बैठकर वह बीड़ी सुलगाता है । अपने सामान ठीक करता है और चुपचाप ,धीरे धीरे बच्चों की संख्या भी गिन रहा होता है । बच्चें थोड़ा डरे से ,थोड़ी शंका में , थोड़े जिज्ञासु से उसके आस-पास खड़े होते है घेरा बना कर । फिर बहुरूपया उन्हें भगा देता है ।
बच्चे गाँव पार करते हुए घरों लौट आते है । सारा हाल घर वालो को कह सुनाते है ।
घर वाले उन यादों में डूब जाते है कुछ क्षणों के लिए , जब वे भी ऐसा ही करते थे । और बताते है की वो फिर आएगा और रोटी-पैसा मांग कर ले जाएगा गाँव में से , उसका बच्चों को घर और गांव से बाहर ले जाना ही उसका खेल और कला है ।
पूंजीवाद ने गाँवों में ऐसे ही प्रवेश किया था कभी । उसके एक पाँव में आधुनिकता का घुँगरू था ,और हाथ में आजादी की लकड़ी जिसपर प्रेम का घुँगरू पायजेब की तरह लटका था । कारखाने में काम करने की वजह से पेंट घुटनो तक चढ़ी थी , और आँखों में फैक्ट्री के काले धुँए का काजल था । उसके अर्ध-पूर्ण, अर्ध-स्वतंत्र और आधे बंधे हुए अस्तित्व के पीछे नए लोग बौरा गए । गाँव के बाहर सुस्ताते हुए उसने सामान खोल कर बीड़ी जलाई और बताने की चेष्टा की कि वह भी जीवन को धुएं में उड़ाना चाहता है । मगर उड़ा नहीं पाया , उड़ा नहीं पा रहा । वह शहर आ कर लोगों को बसनें से पहले चेता कर घर वापस भगा देना चाहता है , मगर लोग नहीं मानते ।
जिस दिन शहरों से निकलकर , लोग बच्चा होकर फिर से घर लौटेंगे । पूंजीवाद की कथा कहेंगे । घरवाले बहुरुपिये को याद करेंगे कुछ क्षणों के लिए ।
अब वह गाँव में लौटेगा , रोटी - पैसा मांगने के लिए । भूमिअधिग्रहण का रूप धर कर ।
Friday, 20 May 2016
भूमि अधिग्रहण का बहुरूपिया
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