सोना है तुम्हारी करवटों के बगल में, तकिए के उस कौने पर जहाँ तुम्हारे दिन भर की खुशबु धुएं की तरह पहुँचती है। तुम्हारें पैरों से उगी सिलवटों में मन का पानी उड़ेल कर बह जाना चाहता हूँ, बिस्तर से और छु लेना चाहता हूँ धरती की नम कब्रगाह को रात के तीसरे पहर।
बिस्तर से नीचे उतर कर पग थलियो से कमरे की ठंडक के अहसास के सहारे धरती के उस अक्ष की तरफ बढ़ जाना है। जहाँ.... जहाँ देह के ध्वस्त होते प्रतिमान ध्यान की गुफाओं के रास्ते बताते है।
तुम दीपक हो, प्रार्थना का। अपना दायाँ अंगूठा करम पर टिका कर ठीक आधी रात में मुक्त कर दो मुझे। दे दो टिकट पूर्व या पश्चिम की यात्रा का।
'टिक टिक तकता टिकट यात्री'
Sunday, 18 September 2016
टिक टिक तकता टिकट यात्री
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