स्वर्ग के पुस्तकालयाध्यक्ष ने किताब रखते हुए कहा कि इंसानियत झट से रो देती हैं। दुःख के बादल किसी भी देश से हो कर गुजरे, वो इंसानियत को भिगोते हुए गुजरते हैं। यह सुनकर द्वारपाल बोला, अपराह्न का खाना खाते हुए मैंने भी देखा है कि स्वर्ग के किवाड़ों पर इंसानियत की प्रार्थनाएँ कुण्डी खड़काती है। और बिना पावती के लौट जाती हैं।
देवपुत्री सुबह सुबह इन्ही प्रार्थनाओं को बीनने धरती पर उतरती हैं। अपने पिता के तकिए पर इन चिठ्ठियों को रखकर अपने कमरे में लौट जाती है। मगर चिठ्ठियों की स्याही को छुड़ाते छुड़ाते वह भी सुबक पड़ती है रात के दूसरे प्रहर।
इंसानियत देवताओं का भी पीछा नही छोड़ती। देवपुत्रियाँ इसी लिए इंसानों के प्रेम में पड़ जाती है। - पुस्तकालयाध्यक्ष ने कहा।
Sunday, 13 November 2016
स्वर्ग का वार्तालाप
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