पूस की पन्द्रहवीं रात थी, और उसकी प्रार्थनाओं का पहला दशक गुजरे आधा दशक हो चुका था। समुद्र किनारे घुटनों के बल बैठा-खड़ा कहता था; 'पिघलो पिता-पिघलो पिता..'
एक रात आँसू सी आँखों वाली देवकन्या रेत पर चलती हुई आई। उसने सीधे ध्यानमग्न अभ्यासी के मस्तक पर दायाँ अँगूठा रख दिया, शक्तिपात करना चाहती थी।
वो हँसा मन ही मन और लीन हो गया फिर से। अगली सुबह रेत पर उसके शरीर से उतरे नमक का ढेर था। उसके होठो से उतरी मिट्टी की परत से एक चिड़िया खेल रही थी, और निरन्तर पानी झर रहा था देह से। देवकन्या सर झुकाये अँगूठा टिकाये लगातार बुदबुदा रही थी।
वह अब उठना चाह रहा था, उठा तो देखा उसके घुटनों के घावों पर बसन्ती चुनरी बाँध गई थी देवकन्या।
अगली शाम को चट्टान पर खड़े होकर, जंगल बुहारती देवकन्या से पूछा उसने। "तुम मेरे मस्तक पर अँगूठा टिकाये क्या बुदबुदा रही थी, मेरे साथ हुआ क्या है आखिर बताओं तो ?"
देवकन्या बोली , " मत जानो तुम्हारे साथ क्या हो रहा है "
"और तुम क्या बुदबुदा रही थी?"
देवकन्या बोली , " पिघलो पिता ! "
Sunday, 30 October 2016
पिघलो पिता
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धरती के देवता
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