Sunday, 13 November 2016

'मुस्कुराहट की आहट'

एक शालीन सी मुस्कान, आते जाते सड़क पर सूरज की जमानत में बिखरती है। और हम गुजर जाते हैं। रोज होता है, मैकेनिक की केबिन वाला हो या पान की थड़ी वाला। कितनी हसीन है सुबह, विश्वात्मा हर रोज अपना पैगाम यूँ ही पहुँचाता है। शाम को हिसाब रखने बैठता हूँ तो सुबह की जमाओ से ही हिसाब कॉपी भर जाती हैं, दिन भर की तमाम व्यस्तताओं को ढक देना होता है इन मुस्कुराहटों के नीचे। कल एक महाशय मिले, बोले माटसाब गुटखे मत खाया करों, सूट नहीं करता है। मैंने कह दिया चचा छोड़ दिए हैं। हम फिर गुजर गए। 
इन गुजरने के बीच जिंदगी चहक जाती हैं, पता नही यह फैसला कब हुआ की सर झुका कर नही चलूँगा सड़क पर। लोग दिखते हैं, तो दुआ सलाम होती हैं। जिंदगी यूँ भी तमाम होती हैं।
छत पर सोना कई तरह से मुफीद है, आसमान और सवाल दोनों अपनी अपनी शक्ति से विस्तारित होते दिखाई देते हैं। सपने और कल्पनाएँ भी। कई बार तो दो बार सो लेता हूँ, दो बजे तक और दो बजे बाद सुबह छह बजे तक। ये दो रातो का सफर बहुत हद तक खुद को दो हिस्सों में देखने का मौका देता हैं। एक, आम इंसान सा जो खुद के श्मशान में पौधे रोपने की कल्पना करता हैं। दूसरा, एक दृष्टा जो इंसानियत,देशी पहचान और समाज को दूर से बदलता और लुढ़कता देखता है। लुढ़कता, यानि की बिना प्रयास के गतिमान होता। 
एक बात कहूँ, कहने से कुछ नही होता। करने से कुछ होता हैं। जीने से बहुत कुछ होता है, और करने और जीने के साथ खुद को बदलने से सब कुछ होता हैं। समाज, मत और स्वतन्त्रता के उपासकों को यह समझ आ जाता है। सो वे लुढ़कते हुए समय में अपना जंतर बो देते हैं। फिर कायनात आभारी सी आगे बढ़ जाती हैं।
हमे खुद में तात्विक बदलाव करने होते है, शल्य चिकित्सा से गहन, महीन और बारीक। तभी जीवन के प्रश्न छत पर सोते हुए हँसते हुए गुजर जायेंगे। वरना क्या है, हम और आप आज है। कल मर जायेंगे।

'प्री दोपहरी'

उम्रदराज अक्टूबर की देर सुबह खेत मे काम करती स्त्री जैसी लगती हैं। थोड़ी ऊब,थोड़ी थकान, आधा खेत खुद जाने की मुस्कान और कमर पर हाथ धर कर घर से आती हुई रोटी का इंतजार। हाथ में लटकी हुई हँसिया भी थोड़ी गर्म होकर थोड़ी थोड़ी देर में मुस्कुरा उठती है, जैसे की छाया का प्रेम उसे बुला बुला कर थक गया हो।

' राधा! आज उमस है मौसम में'

गोकुल, मथुरा, वृन्दावन के मन्दिरों और आश्रमों में कृष्ण और राधा नही मिलती। यहाँ की मिट्टी और हवा में मिलते है दोनों। 
' राधा! आज उमस है मौसम में'
'कान्हा ! तुम्हारे पैरों को चूमने से हवा में नर्म भाप उड़ी थी कल शाम। उस पानी को बादलों ने लेने से इंकार कर दिया, धरती भी उसे छूना नहीं वरन् देखना चाहती थी। वही उमस तुम्हारी उंगलियो की पोरो पर आ बैठी है चुपके से। 
प्रेम का होना और मौसम का रोना एक नहीं है सखा, प्रेम के रोने से मौसम होता हैं। और मौसम के रोने से प्रेम होता हैं। 
असंख्य रोगों का निदान इस दवा से हो जायेगा, जब लोग मौसम की मासूमियत पर वातायन खोल देंगे। बाहरी उमस उन्हें लपेट लेगी धीरे धीरे। फिर बंगाल में गौरांग प्रभु नाच उठेंगे। गुजरात में रास झूम उठेगा। ये अटक से कटक के बीच फैली चादर हैं, जो तुम्हें उमस जैसी दिखती हैं। होठो से निकली साँझ की सरगम को तुम न समझ सकोगे, पूछ लिया करो। प्रेम मेरे हिस्से की व्याख्या है और तुम्हारे हिस्से का मौसम। समझे बुद्धू!'

तुम मेरे प्रेम का लहु हो, जिसे आजकल स्वतंत्रता की आवाज के रूप में याद कर रहा हूँ।

तुम मेरे प्रेम का लहु हो, जिसे आजकल स्वतंत्रता की आवाज के रूप में याद कर रहा हूँ।

'हवा किस ओर बह रही है कान्हा !''

'हवा किस ओर बह रही है कान्हा !''
-" हमारे प्रेम के गर्व से प्रेम के विश्वव्यापी होने की दिशा में राधे। जमुना का तट इस प्रेम का शालीन दृष्टा है, जामुन के पेड़ मुस्कुराते हुए मौन पथिक है। तुम इनसे पूछोगी तो बता नहीं पाएंगे, प्रेम का विस्तार। तुम्हे नदी तटों के किनारे की घास से पूछना होगा, पेड़ो की डाल पर बैठी चिड़िया के कान सूँघने होंगे।
हवा का बहाव और मन का भाव एक जैसा लगता हैं। फिर भी प्रेम की तरफ बढ़ चलने वाली हवा भाव के विरह को लांघ कर बढ़ जाती है। सो आत्मसमर्पण करते हुए भाव हवा की कैद में जकड़ जाते हैं।
पता है राधा! तुम पूछती हो तो लगता है हृदय पर जमी धूल को हथेली से बुहार रही हो। तुम प्रश्न पूछकर भी शिष्या नहीं रहती, और मैं उत्तर खोजकर भी गुरुत्व प्राप्त नही कर पाता। इसीलिए तुम शिष्या से सखी हो जाती हो। अब समझ भी लो की हवा किस ओर बह रही हैं, कभी तुम्हारी ओर, कभी मेरी ओर।
इस बीच हम लघु ब्रह्माण्ड रचकर प्रकृति को वशीभूत करते है। हवा की दिशा हमारे भीतर के भावों को घनीभुत करके प्रेम का रास्ता साफ कर देती है।
वो पंछी देखो, कितना खूबसूरत हैं। देखो तो, हवा की दिशा में।"
#राधा_कृष्ण

" कान्हा ! तुम्हारी कोरों में पानी क्यों रहता है दिनभर आजकल ?"

" कान्हा ! तुम्हारी कोरों में पानी क्यों रहता है दिनभर आजकल ?"
- " प्रेम में पड़ा हुआ मनुष्य इतना तरल होने लगता है, कि भीतर का भाव पानी होकर रिसता है दिन भर। पेड़ से पत्ती गिरी नहीं कि दिया मन रोने, पैरों से उठती हुई धूल या दिये से मिटते हुए अँधेरे के दर्द से भी मन तरल-सरल-विरल होने के बहाने ढूँढता हैं। किसी ने कहा था एक बार, जब प्रेम होगा तो कुछ कह नहीं पाओगे। रो दोगे बिना कारण। इसलिए , दिनभर आँखों की कोरो में पानी भरा रहता हैं।
कल जब कुछ न सूझा तो इसी बात पर आँसू टपकने लगे। मैं देखता रहा निरन्तर, आंसुओं को गिरते और मन को उठते। लगा जैसे इसी तरह बह जाना है निरन्तर। राधा! मुझे प्रेम हो चला हैं। पानी आँखों की नियति है अब। "