इतिहास की कक्षा में उस रोज एक ही लड़की आई थी। टॉपिक खत्म हुआ और अंतिम पाँच मिनट बजे थे सो मैंने पूछ लिया, पिताजी क्या करते है? पढ़ कर क्या बनना चाहती हो? वो भरी हुई थी। बोली पिताजी कुछ नही करते, सिलाई करके पढ़ती हूँ, पता नही आगे क्या करना है। मैंने कहा, जीवन बहुत मुश्किल होगा। मगर तुम्हे दो काम करने का मौका मिला है, पढ़ो और लड़ो।
वो थोड़ी बन्धी। हिम्मत से हुई।
घण्टा लगा, मैं उठकर जाने लगा तो बोली, सर रुकिए जरा। मुझसे मित्रता कर लीजिए न।
मैंने कहा, हम मित्र ही है। जो भी मदद होगी कहना।
उस रात मुझे नींद न आई। सोचा, कैसा है जीवन। उस लड़की को कितनी जरूरत है, सद्भावना की। कितने ही लोग होंगे ऐसे। उनके दुःख और संघर्ष की गिनती कौन करता होगा। ईश्वर! क्यों नही देखता वो हर कौने में।
एक रोज उस लड़की का फोन आया। बोली, आपने साफ़ साफ़ नही बताया की आप मित्रता करेंगे या नही! मैंने कहा, हाँ! हम मित्र हैं। तुम्हे मेरी मित्रता को हाँसिल करने के लिए कोई प्रयास नही करना है। जैसा तुम्हारे साथ हूँ, वैसा हर विद्यार्थी के साथ हूँ। चाहता हूँ, तुम्हारी हिम्मत बची रहे। तुम अपने साथ न्याय करो। आगे बढ़ो। रुको मत।
वो बोली, ठीक है।
इसी तरह की घटनाएं मुझे रोज कुचल कर रख देती है। हमारी लड़कियाँ सच में बहुत अकेली है, उन्हें सहारा नही हिम्मत चाहिए। मैंने दिलासा दिया तो सही उसे। मगर दुःख का जो अकेला रेगिस्तान वो मुझे कर गई। बहुत दिनों तक नही भूलूँगा।
ईश्वर! हिम्मत दे तेरे बच्चों को। ताकि वो पढ़ भी सके और लड़ भी सके।
Sunday, 25 September 2016
एक लड़की
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आमीन।
ReplyDeleteआमीन
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