एक ग्रामीण स्त्री की महक बटी हुई है । उसके कंधो से वजन उठाते हुए बाजुओं की गन्ध है; कपड़ो में सिली हुई। उसके सर से सरसों के तेल की बू आती है; मिट्टी और सिंदूर से भरी हुई। उसके पैरों से खेत की मिट्टी, पगडण्डी की भभूत और आवारा खरपतवार से उड़ कर आए वृताकार काँटों की बास आती है।
उसके ब्लाउज पर दूध के बड़े बड़े चकते मन्डे हुए है, जिससे बास आती है सुबह से रखे दूध सी।
दीवाली, राखी और विवाह के अवसरों पर ही वह रंग रोगन कर पाती है खुद का। देर तक नहा कर। बारहमासी बू को धो कर इत्र से सींचती है, कुछ देर। और खो जाती है समारोह में।
Friday, 23 September 2016
ग्रामीण देह की बू
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क्या खूब कहा रतन जी,बहुत खूब चित्रण लगा की गांव की स्त्री सामने ही हो
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